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सोलर प्रोजेक्ट लगाकर रखे हैं पर कंपनी की बिजली से ही रोशन हो पाते हैं दफ्तर

मंदसौर | सरकार ने जिलास्तर पर बड़े विभागों में सोलर प्रोजेक्ट लगाए। इन्हें लगाए 4 तो कहीं 5 साल हो चुके। देखरेख के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 05:00 AM IST

सोलर प्रोजेक्ट लगाकर रखे हैं पर कंपनी की बिजली से ही रोशन हो पाते हैं दफ्तर
मंदसौर | सरकार ने जिलास्तर पर बड़े विभागों में सोलर प्रोजेक्ट लगाए। इन्हें लगाए 4 तो कहीं 5 साल हो चुके। देखरेख के अभाव के कारण सभी रोशनी से जुड़ी व्यवस्थाएं पूरी तरह से बिजली कंपनी के भरोसे हैं। सौलर सिस्टम पर अमल होता तो लाखों रुपए बच सकते थे। जिला अस्पताल, कंबल केंद्र, मंदसौर पीजी कॉलेज, गर्ल्स कॉलेज में अब भी मासिक बिजली बिल 17 हजार से लेकर 58 हजार रुपए प्रति माह आ रहा है।

केस -1 | मंदसौर के कंबल केंद्र में सिस्टम बंद, 3 साल में 2 लाख 40 हजार का हो चुका है नुकसान

मंदसौर के कंबल केंद्र पर 4 साल पहले सोलर प्लेटें लगाई थी। केंद्र सरकार की योजना में यहां सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने पर काम हुआ। प्लेटें शोपीस बनी हुई है। 3 साल से सिस्टम बंद है। औसत 12 हजार बिजली बिल प्रतिमाह आ रहा। सालभर में 1 लाख 40 हजार तक होता है। सोलर प्लेटों से बिजली बनती तो सालभर में 60 फीसदी तक बिल यानी 80 हजार तक बच जाते। जो 4 साल में 2 लाख 40 हजार तक होते हैं। कंबल केंद्र के प्रबंधक आरके शर्मा का कहना है मशीनों में बैटरी के अलावा तकनीकी समस्या है। बोर्ड को अवगत करा दिया है। मंजूरी मिलने के बाद ही सुधार हो सकेगा। मासिक बिल 12 हजार रुपए प्रतिमाह तक आ रहा है।

केस -2 | गर्ल्स कॉलेज में बेहतर मेंटेनेंस, पीजी में नहीं सुधार हुआ

उच्च शिक्षा विभाग के संस्थाओं में मंदसौर पीजी व गर्ल्स काॅलेज में 6 साल पहले सोलर प्लेटें लगाई थी। इसके बाद से एक ओर जहां गर्ल्स कॉलेज में समय-समय पर मेंटेनेंस होता रहा और मासिक बिजली बिल 25 हजार से 17 हजार पर आ गया। पीजी कॉलेज में तुलनात्मक बड़ा कैंपस होने से प्लेटों के मेंटेनेंस पर ध्यान नहीं दिया। कई बार ऑन-ऑफ में तकनीकी परेशानी रहती है। जनरेटर चलाना पड़ता है। प्लेटों से ऊर्जा उत्पादन होता तो 6 साल में औसतन 2 लाख रुपए की बिजली उत्पादित होती।

गर्ल्स कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पीएल पाटीदार ने बताया हमने 7000 रुपए मासिक बचत की है, 40 फीसदी कैंपस में बिजली की पूर्ति हो जाती है।

केस -3 | जिला अस्पताल में प्लेटें अनुपयोगी, 7 साल में बिजली पर 6 लाख खर्चा

जिला अस्पताल में 7 साल पहले सोलर प्लेटें लगी लेकिन उपयोग नहीं आ सकी। प्लेटें लगाने वाली कंपनी और स्वास्थ्य विभाग के बीच अनुबंध का मामला हाईकोर्ट में है। विभाग को प्रतिमाह 50 हजार रुपए बिजली बिल चुकाना पड़ रहा है। 7 साल में बिजली बिल की राशि औसत 6 लाख तक पहुंच गई है। साैर ऊर्जा सिस्टम पर काम होता तो 60 फीसदी यानि 3 लाख 60 हजार रुपए बचा लिए जाते। प्लेटें होने के बाद भी बैटरी, तकनीकी प्रबंध नहीं हो सके हैं। सीएस डॉ. एके मिश्रा का कहना है न्यायालयीन प्रक्रिया में अब तक स्थिति साफ नहीं हो सकी है।

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Web Title: सोलर प्रोजेक्ट लगाकर रखे हैं पर कंपनी की बिजली से ही रोशन हो पाते हैं दफ्तर
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