‘प्रेम की पुकार से भगवान प्रकट होते हैं’
पिपलौदा | प्रेम संसार का ऐसा तत्व है जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। इसी प्रेम की पुकार पर भगवान प्रकट होते हैं। प्रेम भक्ति का ही एक रूप है। भक्ति की लता प्रेम की डोर पर चढ़कर ही अपने आराध्य तक पहुंचती है, जबकि श्रद्धा यहां पर मात्र भक्ति को स्पष्ट करने का काम करती है।
यह बात समन्वय मिशन के प्रेरक, राष्ट्रसंत आचार्य डॉ. दिव्यानंद सुरीश्वर जी (निराले बाबा) ने कही। धर्मसभा में उन्होंने कहा श्रद्धा और भक्ति एक दूसरे के पूरक हैं लेकिन अंधश्रद्धा या अंधभक्ति दोनों ही व्यक्ति के लिए घातक हैं। व्यक्ति किसी के प्रति श्रद्धा रखे या भक्ति सब में समीक्षापरक होना चाहिए। देख सुनकर ही किसी पर अपनी श्रद्धा भक्ति स्थिर नहीं करना चाहिए ।