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मान लिया तो हार है और ठान लिया तो जीत - संत ललितप्रभ

एक वर्ष पहले
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मल्हारगढ़ | राष्ट्रसंत ललितप्रभ महाराज ने कहा कि यह ना सोचें कि कितने दिन जीयें बल्कि यह सोचें कि कैसे जीयें। खुशियोंभरा एक लम्हा भी खजाने जैसा लगता है पर गम भरा एक साल भी अंधेरी गुफा में भटकने जैसा लगता है। जिंदगी जीने का मकसद खास होना चाहिए, अपने आप पर हमें विश्वास होना चाहिए। जीवन में खुशियों की कमी नहीं है, बस उन्हें मनाने का सही अंदाज़ होना चाहिए। हर समय इतने व्यस्त रहिए कि चिंता करने की फुर्सत ही न मिले। विश्वास रखिए जो चोंच देता है वह चुग्गा अवश्य देता है। आप प्रसन्न रहेंगे, तो आप अपने लोगों को भी प्रसन्न करने में कामयाब हो जाएंगे। उदास रहेंगे तो सारा माहौल गमगीन होने लग जाएगा। यह बात राष्ट्रसंत ललितप्रभ महाराज ने कहा कही।

संत प्रवर शनिवार को देवराज चौक स्थित न्यू कॉम्प्लेक्स में आयोजित प्रवचन कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हार और जीत का संबंध हमारी सोच पर है। मान लिया तो हार होगी और ठान लिया तो जीत। कोई आपके खिलाफ दो टेढ़े शब्द बोले तो बुरा ना मानें, क्योंकि पत्थर अक्सर उसी पेड़ पर मारे जाते हैं जिस पर मीठे फल लदे होते हैं। आप जब भी बोलें, धीमें और धैर्य से बोलें। आपकी वाणी औरों के दिलों में प्यार और जिज्ञासा का झरना बहाएगी। शीशा और रिश्ता दोनों एक जैसे होते हैं। पत्थर मारने से शीशा टूटता है और टेढ़ा बोलने से रिश्ता। अदब से बोलिए और संभलकर चलिए, शीशा और रिश्ता दोनों सुरक्षित रहेंगे। पत्थर मारने से सिर फूटता है और लाठी मारने से कमर टूटती है, पर टेढ़ा शब्द बोलने से दिल भी टूटता है और रिश्ता भी। गलती सबसे होती है और गुस्सा सबको आता है, फिर बुरा मानने की बजाय क्यों ना शांति और सुधार की किरण तलाशी जाए। इससे पूर्व संत ललितप्रभ महाराज और मुनि शांतिप्रिय सागर महाराज के देवरा चौक पहुंचने पर श्रद्धालुओं द्वारा स्वागत और अभिनंदन किया गया। प्रवचन कार्यक्रम में कई लोग उपस्थित थे। रविवार को सुबह 9 बजे पिपलिया मंडी में पुराना गाड़ी अड्डा में जीवन को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर सत्संग एवं प्रवचन करेंगे।
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