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जिस जगह संतों का आत्मीय सम्मान होता है, वहां समृद्धि व शांति रहती है

एक वर्ष पहले
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शुक्रवार को दिगंबर संत मुनिश्री प्रतीकसागर महाराज साहब का नगर प्रवेश हुआ। सकल श्रीसंघ ने अगवानी कर बैंड-बाजों के साथ नगर में जुलूस निकाला। संतश्री को महावीर भवन में पहुंचाया। यहां पर 19 मार्च तक नगर परिषद प्रांगण में सर्वधर्म सत्संग करेंगे।

मुनिश्री प्रतीकसागर ने धर्मसभा मेंं कहा कि मैं 18 वर्ष बाद सीतामऊ में प्रेम का संदेश लेकर आया हूं। यहां महावीर के चरित्र को समझाने के लिए आया हूं। महावीर का स्थान मंदिरों में नहीं है। प्राणीमात्र में है। सीतामऊ भले ही छोटा है लेकिन यहां संतों का सम्मान होता है। जहां संतों का आत्मीय सम्मान होता है, वहां समृद्धि और शांति रहती है। उन्हाेंने कहा की जीवन में शांति के लिए मन का विस्तार किया जाना आवश्यक है। जीवन में बदलाव के लिए वस्त्र नही चरित्र बदलने की आवश्यकता है। कहा कि स्वयं के मन को जीतने वाला ही महावीर बन सकता है। बड़ा
मकान होने से व्यक्ति बड़ा नहीं होता, कुछ लोग दिल में उतरते हैं और कुछ दिल से उतर जाते हैं। चित्र को संभालने की बजाय चरित्र को संभालना चाहिए। दीपक को प्रज्वलित करते हैं, जलाते नहीं। गीत की प्रैक्टिस करना पड़ती है गाली की नहीं। दूध बेचने के लिए जाना पड़ता, शराब के लिए नहीं। बुराई स्वतः आती है अच्छाई के लिए प्रेरित करना पड़ता है।

मुनिश्री प्रतीकसागरजी महाराज का नगर आगमन हुआ।
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