--Advertisement--

 

इस बुधवार को देश ने खौफनाक दृश्य देखा कि कैसे एक महारानी के सम्मान की रक्षा के नाम पर अधिकतर युवाओं वाली पद्‌मावत...

Danik Bhaskar | Jan 26, 2018, 02:35 AM IST
इस बुधवार को देश ने खौफनाक दृश्य देखा कि कैसे एक महारानी के सम्मान की रक्षा के नाम पर अधिकतर युवाओं वाली पद्‌मावत विरोधी भीड़ ने गुरुग्राम (गुड़गांव) में केजी के 24 बच्चों को ले जा रही बस पर हमला कर दिया और बच्चे खिड़की पर बरसती ईंटों और खिड़की के कांच के टुकड़ों से बचने के लिए कैसे कांपते हुए बस के फर्श पर दुबके बैठे थे।

कुछ दिन पहले एक अन्य घटना में छात्रों का एक समूह मध्यप्रदेश के रतलाम शहर में स्थित स्कूल में घुसा। उन्हें स्कूल के वार्षिकोत्सव में बजाए जा रहे ‘घूमर’ गीत के स्वर सुनाई दिए थे। उन्होंने पूरे स्कूल परिसर में तोड़-फोड़ मचा दी।

दोनों घटनाओं ने असंदिग्ध रूप से यह सिद्ध कर दिया कि हमारी युवा पीढ़ी की एक बड़ी संख्या बहुत आक्रामक है और एक राष्ट्र के रूप में हमें इसे कम करने के लिए कुछ करना चाहिए।

पालकों के व्यवहार से लेकर सामने उभरती घटनाओं के प्रति समाज की प्रतिक्रिया तक ढेर सारे कारणों को अलग रख दें तो कुछ अध्ययनों में दावा किया गया है कि हमारे बच्चों को शिक्षा देते समय प्राकृतिक वातावरण का इस्तेमाल एक ऐसा तरीका है, जो हमें वह वांछित समाज देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जो हम भविष्य में देखना चाहते हैं।

अमेरिका के अरबाना शैम्पेन स्थित इलिनॉय यूनिवर्सिटी के नेचरल रिसोर्सेस एंड एनवायरनमेंटल साइसेंस विभाग में कराए अध्ययन के नतीजे कुछ हफ्ते पहले ऑनलाइन जर्नल ‘फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी’ में प्रकाशित हुए हैं। इसके मुताबिक खुले में कक्षा लगाने से न सिर्फ विद्यार्थियों का ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है बल्कि उनके ग्रेड सुधरने के साथ शिक्षकों का परफार्मेंस भी सुधरता है। इसके अलावा विद्यार्थी व शिक्षक दोनों में तनाव का स्तर भी कम होता है। ‘रिडायरेक्ट’ (छात्र का ध्यान विषय पर लाने के लिए शिक्षक का बीच में रुकना) की संख्या भी महत्वपूर्ण ढंग से घटती है। मुख्य शोधकर्ता मिग कुओ ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘ यदि हम रिडायरेक्ट दर की गणना करें तो प्राकृतिक वातावरण में मोटेतौर पर 6.5 मिनट में एक बार शिक्षक को रुकना पड़ा है जबकि कक्षा में यह दर 3.5 मिनट है।’

सरल शब्दों में अध्ययन का कहना यह है कि हमें पुरानी गुरुकुल पद्धति को अपनाना चाहिए। ऐसा लगता है कि प्रकृति में दिए सबक छात्र को अगले सबक में अधिक केंद्रित होने योग्य बनाते हैं। प्रायोगिक अध्ययन में हाईस्कूल के विद्यार्थियों को खिड़की में से हरियाली दिखाई गई जिससे उनकी दिल की धड़कन और तनाव में व्यवस्थित तरीके से गिरावट आई, जबकि जहां ऐसी खिड़की नहीं थी वहां यह नहीं देखा गया। स्पष्ट है कि अध्ययन के मुताबिक प्रकृति का सान्निध्य ध्यान केंद्रित करने और याददाश्त पर सकारात्मक असर डालता है। अटेंशन रेस्टोरेशन थ्योरी कहती है कि प्राकृतिक दृश्य ‘सॉफ्ट फेसिनेशन’ की स्थिति का संचार करते हैं, जिससे मानसिक मांसपेशियां विश्राम की अवस्था में आ जाती हैं। स्टडी यह भी कहती है कि स्कूल परिसर में किसी हरे-भरे स्थल पर सबक देने से कक्षा के भीतर होने वाले अगले सबक में ध्यान केंद्रित करने की बच्चों की क्षमता बढ़ जाती है। मैसाच्युसेट्स पब्लिक स्कूल के आसपास हरियाली के कई वर्षों तक किए आकलन में हरियाली व मानक टेस्ट स्कोर में सकारात्मक आपसी संबंध पाया गया। ये सारी चीजें व्यक्ति को शांत, फोकस्ड और विश्लेषण क्षमता संपन्न बनाती हैं।

न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि पेड़ों से घिरी जगह में बेहतर गुणवत्ता की हवा में सांस लेने का हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और इसी तरह हमारे आसपास के वातावरण का इंद्रियों को महूसस होने वाला अनुभव भी यही असर डालता है। रेत, घास या पत्थर की बेंच पर बैठने मात्र से सीखने की प्रक्रिया और जीवन पर उसके प्रेक्टिकल अप्लिकेशन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

फंडा यह है कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के मुताबिक एक बच्चा करीब 25,000 घंटे स्कूल में गुजारता है और भिन्न प्रकार की पद्धतियां अपनाकर उसे अधिक शांत बनाने के लिए इतना वक्त काफी है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in