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बाबाओं की बैसाखी पर सवार मप्र की शिवराज सरकार

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनावों को आसन्न देख पांच बाबाओं को राज्य मंत्री का...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 05, 2018, 03:45 AM IST

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनावों को आसन्न देख पांच बाबाओं को राज्य मंत्री का दर्जा देकर एक किस्म का विवाद पैदा किया है। सरकार का दावा है कि इन बाबाओं ने वृक्षारोपण, नर्मदा सफाई और जल संरक्षण के लिए काम किया है और इसीलिए उन्हें यह सम्मान दिया गया है। कांग्रेस इसे राजनीतिक हथकंडा बता रही है, जिसे चुनाव जीतने के लिए चौहान सरकार ने अपनाया है। सवाल इन स्थानीय आरोप-प्रत्यारोपों से भी आगे का है कि क्या इस देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान की भावना धर्मगुरुओं को राजसत्ता सौंपने के पक्ष में है? इस देश के इतिहास की विडंबना है कि संत की तरह रहने वाले और लंगोटीधारी महात्मा गांधी ने भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने का विचार रखा था और टाई सूट पहनने वाले बाबा साहेब ने धर्मनिरपेक्ष संविधान की रचना करने के बावजूद स्वयं बौद्ध धर्म ग्रहण किया। बाबा साहेब ने कई बार यह महूसस किया था कि महात्मा गांधी के व्यक्तित्व में संत और राजनेता दोनों विद्यमान हैं, इसलिए कई बार राजनीतिक रूप से उनका मुकाबला करने में दिक्कत आती है। लेकिन उन लोगों के धर्म और राजनीति के मानक उच्चस्तरीय थे और उनका बाह्य आडंबर से कम से कम वास्ता था। यहां मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर न सिर्फ राजनीति की मर्यादा को आहत किया है बल्कि धर्म की मर्यादा को बेदाग नहीं छोड़ा है। आमतौर पर मंत्री उसे बनाया जाता है, जो चुनाव जीतकर आया हो। अगर नहीं आया है तो मंत्री बनने के छह माह के बाद उसे चुनाव जीतने की बाध्यता होती है। इस संवैधानिक दायरे से अलग सरकारों ने राज्यमंत्री का दर्जा देकर संविधान को बाइपास करने की परंपरा डाली है। दूसरी तरफ बाबा या साधु होने का मतलब है कि वह व्यक्ति प्रवृत्ति मार्ग से निवृत्ति मार्ग की ओर चला गया है और उसके लिए सांसारिक सुखों का कोई अर्थ नहीं है। आज अगर शिवराज सिंह चौहान ने इन हथकंडों का सहारा लिया है तो उससे साफ जाहिर है कि वे भाजपा सरकार के चौदह वर्षों के काम से जनता को संतुष्ट नहीं कर पाए हैं। किसान, दलित, व्यापारी, मध्यवर्ग और कर्मचारी सभी उनकी व्यवस्था से दुखी और नाराज हैं। यह समय-समय पर जनअसंतोष के माध्यम से व्यक्त भी होता रहा है। ऐसे में बाबाओं का दामन थामकर वे अपनी वैतरणी पार लगाना चाहते हैं।

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