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हमें दुनिया वैसी दिखती है जैसी हमने भीतर बनाई है

अपने ध्यान को शरीर में मौजूद ऊर्जा के चक्रों पर केंद्रित कीजिए और आप पाएंगे कि नकारात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे गायब हो...

Dainik Bhaskar

Mar 28, 2018, 06:45 AM IST
हमें दुनिया वैसी दिखती है जैसी हमने भीतर बनाई है
अपने ध्यान को शरीर में मौजूद ऊर्जा के चक्रों पर केंद्रित कीजिए और आप पाएंगे कि नकारात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे गायब हो गई। यदि ईर्ष्या महसूस हो तो नाभि पर ध्यान केंद्रित कीजिए। फिर ईर्ष्या अपने आप खत्म हो जाएगी।

श्री श्री रविशंकर संस्थापक, आर्ट अॉफ लिविंग

हमें वही दुनिया दिखती है, जो हमारे मन में मौजूद होती है, जिसकी हमने अपने तरह से कल्पना की है। हो सकता है बाहर की दुनिया अलग हो। ‘विश्व’ अद्‌भुत शब्द है- ‘श्व’ का मतलब है बीता हुआ कल या आने वाला कल और ‘विश्व’ का मतलब है वह विशेष बीता हुआ या आने वाला कल जो हमने अपने दिमाग में बना रखा है। हम बीते कल की चिंताओं में फंसे हैं और आने वाले कल की कल्पना करते हैं। यही वजह है कि हममें उत्साह का अभाव हो जाता है।

अवलोकन कीजिए कि आपकी ज़िंदगी दिन-प्रतिदिन किस दिशा में जा रही है। क्या आपका उत्साह बढ़ रहा है अथवा घटता जा रहा है? पांच या छह साल के बाल को या तीन से छह माह के लड़खड़ाकर चलते बच्चे को देखिए। वे उत्साह से छलछला रहे होते हैं। उनकी तुलना वयस्कों से कीजिए और देखिए कि उत्साह उम्र के साथ बढ़ता या घटता जाता है। क्या उत्साह खोकर क्या हम वाकई जी रहे होते हैं? यह हमारे अपने ‘विश्व’ के कारण हुआ- हमने अपनी दुनिया ऐसी बना ली। समाधान आपके शरीर में है।

शिवसूत्र में कहा गया है, ‘शक्ति चक्र साधने विश्वासंहारा:।’ जब आप अपना ध्यान शरीर के ऊर्जा चक्रों पर लगाते हैं तो वे सांसारिक चिंताएं और विचार विदा हो जाएंगे, जो आपको तकलीफ दे रहे थे। जब आप गुस्सा होते हैं तो दो भौहों के बीच का क्षेत्र उत्तेजित होता है। जब आप भावुक होते हैं तो गला रूंध जाता है। जब घृणा महसूस करते हैं तो दिल के क्षेत्र में संवेदना महसूस होती है। जब ईर्ष्या हो तो क्या महसूस होता है? पेट में मरोड़ उठती है। अच्छी इच्छाएं भी पेट में जन्म लेती है। आप बहुत प्रसन्न होते हैं तो नाभि के अासपास के क्षेत्र में कुछ संवेदनाएं महसूस होती है। इसी प्रकार ईर्ष्या या प्रेम महसूस होने पर दिल के आसपास संवेदनाएं महूसस होती हैं। हमारे शरीर में सात चक्र व ऊर्जा केंद्र हैं और 27 हजार सूक्ष्म नाड़ियां इनसे जुड़ी हैं। पहला चक्र मूलाधार है, जहां ऊर्जा सुषुप्त या सक्रिय होती है। यहां से शक्ति उठकर स्वाधिष्ठान चक्र तक जाती है, जहां यह रचनात्मकता अथवा वासना के रूप में व्यक्त करती है। जब यह उठकर मणिपुर चक्र तक जाती है, जो नाभि के आसपास का क्षेत्र है तो यह ईर्ष्या, उदारता, खुशी या लालच के रूप में व्यक्त होती है। तीनों चीजें यहीं होती हैं। यही ऊर्जा दिल यानी अनाहत चक्र तक उठती है तो यह प्रेम, घृणा और भय के रूप में व्यक्त होती है।

जब डरे हुए हों तो आप दिल पर हाथ रख लेते हैं और प्रेम या सम्मान व्यक्त करते समय भी यही करते हैं। जब यह ऊर्जा दिल यानी विशुद्ध चक्र तक पहुंचती है तो यह अाभार या कंजुसी से व्यक्त होती है। जब आप दुखी होते हैं या आभार व्यक्त करते हैं तो गला रूंध जाता है। इसके बाद ऊर्जा भौहों के बीच में स्थित स्थान पर जाती है, जिसे आज्ञा चक्र कहते हैं। वहां यह जागरूकता, ज्ञान और क्रोध के रूप में व्यक्त होती है।

आखिरकार, जब यही ऊर्जा सिर के शीर्ष यानी सहस्रार चक्र तक उठती है तो सिर्फ शेष रहता है आनंद। आमतौर पर ऊर्जा इसी तरह यात्रा करती है। लेकिन जब हम दबाव में होते हैं या विचलित होते हैं तो चक्रों में गठानें बन जाती हैं और ऊर्जा के प्रवाह में बाधा आ जाती है। अपने ध्यान को ऊर्जा के इन चक्रों पर केंद्रित कीजिए और आप पाएंगे कि नकारात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे गायब हो गई। यदि ईर्ष्या महसूस हो तो नाभि पर ध्यान केंद्रित कीजिए तो ईर्ष्या अपने आप खत्म हो जाएगी। हमें समझ में आता है कि चक्रों में अशुद्धि के कारण ऐसा हुआ था। ‘शक्ति चक्र साधने विश्वासंहारा:’ यानी ध्यान के माध्यम से चक्रों के संपर्क में आएंगे तो दुनिया यानी इसकी चिंताएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।

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