Hindi News »Madhya Pradesh »Mhow» मोदी नेता नंबर वन, पर विश्वसनीयता संकट में

मोदी नेता नंबर वन, पर विश्वसनीयता संकट में

वर्ष 1996 में ‘हवाला’डायरियों में नाम आने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने संसद से इस्तीफा दे दिया था। हमने आडवाणी से पूछा...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 25, 2018, 04:25 AM IST

मोदी नेता नंबर वन, पर विश्वसनीयता संकट में
वर्ष 1996 में ‘हवाला’डायरियों में नाम आने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने संसद से इस्तीफा दे दिया था। हमने आडवाणी से पूछा कि उन्होंने यह फैसला क्यों लिया, जिसे कई लोग अतिवादी कदम मानते हैं। उन्होंने कहा, ‘यह अंतररात्मा की आवाज पर लिया गया फैसला है। मैं ऐसी पार्टी का हूं, जो अलग होने का दावा करती है और सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा के लिए प्रतिबद्ध है।’

भाजपा के अलग दल होने का आशय उसी साल नज़र आया, जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिनों के भीतर गिर गई। भाजपा के एक तबके ने तब गर्व महूसस किया था कि इसमें पार्टी का अनोखापन दिखता है, जो कांग्रेस के विपरीत सत्ता की भूखी नहीं है। अब कर्नाटक की घटनाओं ने यह पक्का कर दिया है कि वह मुखौटा अाखिरकार गिर गया है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और चुनावों में अजेय होने के अहंकार के आगे नैतिक श्रेष्ठता हवा हो गई। भाजपा का अलग होना विचारधारा और आदर्शवाद के जुड़वा स्तंभों पर आधािरत था। राजनीति के बाजार में हिंदू राष्ट्रवाद की मूल विचारधारा इसकी यूएसपी थी लेकिन, सही-गलत की स्पष्ट धारणाएं थीं, जिसके बारे में पार्टी का दावा था कि वह आरएसएस के नैतिक विश्व-दृष्टि से आई थीं। आरएसएस प्रचारक को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता था, जो न सिर्फ हिंदू राष्ट्र के विचार से बल्कि किफायत, आत्म-अनुशासन और सत्य-निष्ठा से जुड़ी मूल्य आधारित राजनीति से भी बंधा था। माना जाता था कि नैतिकता के बीज सुबह की शाखा में सेना जैसे प्रशिक्षण के दौरान बोए जाते थे। यह ऐसी नैतिक शिक्षा थी, जो कांग्रेस के गांधीवादी मूल्यों से अलग जाने की प्रवृत्ति के ठीक विपरीत थी। आडवाणी-वाजपेयी सख्त ‘शाखा’ संस्कृति के प्रोडक्ट थे और उसी तरह नरेन्द्र मोदी और अमित शाह भी हैं।

वायपेयी और आडवाणी उस कांग्रेस युग में ढले, जब स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा ने भारत पर पूरे प्रभुत्व के साथ लगभग 40 साल राज किया। तब भाजपा (तब जनसंघ) हाशिये पर पड़ी ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ के वैचारिक आधार वाली ब्राह्मण-बनिया पार्टी मानी जाती थी। इसी ने उसकी वृद्धि को सीमित रखा। राम जन्मभूमि आंदोलन और 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस संघ परिवार के विकास में निर्णायक मोड़ था,जब हाशिये पर पड़े समूह से वह भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया।

इसके बावजूद हवाला डायरियों पर आडवाणी के इस्तीफे ने दिखाया कि यह अब भी ऐसी पार्टी थी, जिसमें एक हद तक वैचारिक कठोरता के साथ राजनीतिक आदर्शवाद का भी सह-अस्तित्व था। बहुसंख्यकवाद की विचारधारा ने भाजपा को मूल समर्थक दिए, जो भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। भाजपा के नेतृत्व के ‘सदाचारी’ चरित्र ने धीरे-धीरे उन भारतीयों को भी आकर्षित किया, जो कांग्रेस के भ्रष्टाचार व वंशवाद से तंग आ गए थे। इसी वोट ने वाजपेयी को पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाला देश का पहला गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बनाया और निर्णायक तरीके से मोदी को 2014 में भाजपा की सरकार बनाने के योग्य बनाया। लेकिन, जहां वाजपेयी-आडवाणी युग तुलनात्मक रूप से ‘राजधर्म’ या अच्छे शासन को कर्तव्य मानने की समावेशी धारणा का दावा करता था, वहीं मोदी-शाह का दौर बिना किसी खेद के उस ‘चाणक्य नीति’ पर चल रहा है, जिसे हर कीमत पर सत्ता हासिल करने का रूपक माना जाता है। फिर साधन चाहे जो हों। जहां आडवाणी 1990 के दशक के मध्य में पार्टी के वैचारिक अलगाव में शरण लेते थे, शाह पूरी निर्दयता के साथ कश्मीर से केरल तक पार्टी की छाप छोड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं, जिसमें वे विरोधियों को प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं बल्कि ‘शत्रु’ के रूप में लेते हैं। इस प्रक्रिया में भाजपा सत्ता की आकांक्षा रखने वाली एक और विपक्षी पार्टी से बदलकर स्वतंत्रता बाद की सबसे प्रभावी व अजेय चुनावी मशीन बन गई है। परिणाम यह हुआ है कि जहां हिंदुत्व की विचारधारा के लिए इसकी प्राथमिक प्रतिबद्धता जम्मू-कश्मीर में पीडीपी जैसे ‘अपवित्र’ गठबंधन बनाने के दौरान किए समझौतों के बावजूद अक्षुण्ण दिखाई देती है वहीं लगता है कि सत्ता के लिए भाजपा के आदर्शवाद से समझौता किया जा सकता है। कर्नाटक (और इसके पहले गोवा और मणिपुर) में ठीक यही हुआ। ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत पर जोर देते रहने से भाजपा कांग्रेस के उन्हीं तरीकों का अनुसरण करने लगी, जिनसे कभी उसे इतनी नफरत थी। कर्नाटक में सत्ता हासिल करने की भाजपा की कोशिशों पर स्पष्टीकरणों में राजभवनों के दुरुपयोग के कांग्रेस के रिकॉर्ड की ओर इशारा किया गया। लेकिन कांग्रेस का संवैधानिक संस्थानों का महत्व घटाने का दोषी होना, उसी तरह का व्यवहार करने का कारण नहीं हो सकता। सही है कि कर्नाटक में कांग्रेस भी सत्ता हासिल कर दक्षिण में मोदी-शाह के महारथ को रोकने के लिए बेचैन थी पर क्या इसका पैसे व बाहुबल पर आधारित वैसा ही जवाब देना जरूरी था? कांग्रेस से कोई नैतिक या राजनीतिक समानता दिखाने का प्रयास यही बताएगा कि अब भाजपा ‘पार्टी विद डिफरेंस’ नहीं है।

2014 में मोदी ने लाल किले की प्राचीर से वादा किया ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ तो उनका जोरदार स्वागत हुआ था। 2018 कर्नाटक चुनाव में रेड्‌डी बंधु जैसे लोग केंद्रीय भूमिका में आ गए और चुनाव के बाद विधायकों को पाला बदलने के लिए प्रेरित कर बहुमत हासिल करने के जैसे प्रयास हुए उससे वह नैतिक आभामंडल उठ गया है। मोदी अब भी भारत के नेता नंबर वन है लेकिन, भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा मसीहा होने की उनकी विश्वसनीयता संकट में है, जो देश की भद्‌दी राजनीतिक संस्कृति बदल देगा।

पुनश्च : कर्नाटक में 58 घंटे के भाजपा मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा के इस्तीफे के बाद उनके ‘त्याग’ की तुलना 1996 में वाजपेयी के इस्तीफे से करने के प्रयास हुए। सही है लेकिन, जहां वाजपेयी ने प्रथम उपाय के रूप में इस्तीफा दिया, वहां येद्दियुरप्पा ने लग्ज़री रिसॉर्ट से कांग्रेस-जद (एस) विधायकों को बाहर लाने के सारे प्रयास नाकाम होने के बाद अंतिम उपाय के रूप में इस्तीफा दिया। पुराने दिनों में अंग्रेजी में कहा जाता था कि पोलिटिक्स इज़ द लास्ट रिसॉर्ट ऑफ स्काउंड्रल (यानी राजनीति दुर्जनों की अंतिम आश्रय स्थली है) लेकिन अब कह सकते हैं कि रिसॉर्ट इज़ द लास्ट पोलिटिक्स ऑफ स्काउंड्रल (रिज़ॉर्ट दुर्जनों की अंतिम राजनीति है) (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

rajdeepsardesai52@gmail.com

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Mhow

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×