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नहरें जर्जर, श्याेपुर को नहीं मिल रहा हक का पूरा पानी, योजना 28 साल से फाइलों में

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 04:01 AM IST

Murena News - पंजाब की तरह मध्यप्रदेश और राजस्थान के किसानों को चंबल नहर से 12 महीने सतत पानी उपलब्ध कराने के लिए बनी वृहद सिंचाई...

Morena News - mp news canal is not found in shajarpur full water supply plans for 28 years
पंजाब की तरह मध्यप्रदेश और राजस्थान के किसानों को चंबल नहर से 12 महीने सतत पानी उपलब्ध कराने के लिए बनी वृहद सिंचाई परियोजना एक बार फिर दोनों राज्य में एक ही दल की सरकार अाने से इसके आगे बढ़ने की उम्मीद जागी है। यह परियोजना 28 साल से फाइल में दबी है। चंबल का नहरी तंत्र जर्जर होने से मध्यप्रदेश को हक का पूरा पानी नहीं मिल पा रहा है। टेल पर पानी पहुंचने में भी दिक्कत आ रही है। क्षेत्रीय विधायक बाबू जंडेल सिंह ने रविवार को बताया कि वृहद सिंचाई परियोजना के अपडेशन को लेकर हुए निर्णय के रिव्यू के लिए दोनों राज्यों के बीच उच्च स्तरीय बैठक बुलाने की मांग वह जल्द मुख्यमंत्री से मिलकर करेंगे। जरूरत पड़ी तो मुद्दा विधानसभा में उठाया जाएगा। दोनों राज्यों ने मिलकर 1973 में इस परियोजना का खाका तैयार किया था। इसके तहत किसानों को खेती और बागवाजी के अलावा चंबल कमांड क्षेत्र में खेतों में मछली पालन और पशुपालन के लिए भी नहर का पानी उपलब्ध कराना था। योजना का मकसद किसानों के लिए आमदनी के स्रोत बढ़ाकर उनकी माली हालत में सुधार लाना था। इस संबंध में वर्ष 2005 में हुई संयुक्त नियंत्रण मंडल की बैठक में परियोजना को आगे बढ़ाने पर दोनों राज्य सरकारों ने सहमति जताई। लेकिन इसके बाद परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई।

वहीं 60 के दशक में बनी चंबल सिंचाई परियोजना का नहरी तंत्र 59 बरस पुराना और जर्जर हो गया हैं। इससे नहरों की जलधारण क्षमता कम हो गई है।

श्योपुर, मुरैना व भिंड जिले की 2.84 लाख हेक्टेयर में होती है सिंचाई

जर्जर हालत के चलते चंबल दाहिनी मुख्य नहर में क्षमता के अनुरूप नहीं चलता पानी।

28 साल में महज दो बार हुई नियंत्रक मंडल की बैठक, 13 साल से अटके अपडेशन के निर्णय

मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त चंबल वृहद सिंचाई परियोजना को लेकर पिछले 28 सालों से गंभीर नहीं है। इस परियोजना के लिए 45 साल पूर्व 1973 में गठित अंतरराज्यीय नियंत्रण मंडल के शुरूआती 16 सालों में तो नियमित 11 बैठकें हुई, लेकिन वर्ष 1989 के बाद से नियंत्रण मंडल की सिर्फ दो बैठकें 1999 में तथा 2005 में हुई थी। परियोजना को अपडेट करने के लिए नियंत्रण मंडल की बैठकें होना जरूरी हैं। संयुक्त नियंत्रण मंडल दोनों राज्यों के जलसंसाधन विभाग के प्रमुख शासन सचिव को उच्चस्तर पर बैठक बुलाने के लिए कई बार पत्र लिख चुका है। पिछले 13 साल से नवीनीकरण को लेकर अटके हुए फैसलों पर निर्णय नहीं लिया जा सका है। परियोजना अपडेशन मास्टर प्लान रिव्यू के लिए चर्चा करना नहीं होना चंबल कमांड क्षेत्र के लाखों किसानों पर भारी पड़ रहा है।

मुख्यमंत्री से मिलकर करूंगा मांग


3 जिलों में 2.84 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में होती है सिंचाई

चंबल दाहिनी मुख्य नहर से मध्यप्रदेश में श्योपुर, मुरैना एवं भिंड जिले की 2 लाख 84 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई होती हैं। जबकि राजस्थान में इस नहर से कोटा एवं बारां जिले में 2 लाख 29 हजार हेक्टेयर रकबा सिंचित होता है।पंगत में आगे होने से राजस्थान तो अपनी जरूरत का पूरा पानी ले रहा है, लेकिन मप्र को करार के अनुसार हक का पानी कई साल से पूरे सीजन के दौरान दो दिन के लिए भी नहीं मिला है।

इधर चंबल नहर में 3580 क्यूसेक हुआ पानी

राजस्थान में गेहूं की फसल में दूसरी सिंचाई से निपटने के साथ ही चंबल दाहिनी मुख्य नहर में पानी बढ़ा है। पार्वती एक्वाडक्ट पर रविवार को पानी की मात्रा 3580 क्यूसेक मापी गई। 5 दिन से मप्र को 3580 से 3600 क्यूसेक पानी मिल रहा है। यह करार से करीब 300 क्यूसेक कम है। चंबल नदी के पानी के बंटवारा अनुबंध के मुताबिक मध्यप्रदेश को 3900 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए। जल संसाधन विभाग के ईई एससी गुप्ता ने बताया कि जिले की सभी 27 डिस्ट्रीब्यूटरी एवं माइनर शाखाओं में पानी छोड़ा जा रहा है। उधर किसानों का कहना है कि खाद की किल्लत के कारण नहरों में चलने के बावजूद खेतों में नहीं छोड़ पा रहे हैं।

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