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अस्पताल में बर्न यूनिट नहीं, मुरैना रैफर करना पड़ता है, बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं मरीज

एक वर्ष पहले
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आग से झुलसे हुए मरीजों काे तत्काल इलाज उपलब्ध हो ऐसी व्यवस्था सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कैलारस में नहीं है। करीब तीन लाख की आबादी को स्वास्थ्य लाभ देने की जिम्मेदारी संभालने वाले इस अस्पताल में जले हुए मरीज को भर्ती करने के लिए बर्न यूनिट न होना लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है, ऐसे में झुलसे मरीजों को या तो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है या फिर 50 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय मुरैना पर जाकर इलाज के लिए मजबूर हो रहे हैं।

नगर एवं आसपास के क्षेत्र में आग से झुलसने पर कैलारस अस्पताल से जुड़े मरीज इसलिए भरोसे के साथ कैलारस अस्पताल आते हैं कि उन्हें यहां तत्काल इलाज मिल जाएगा एवं उनकी जान बच जाएगी। लेकिन यहां पर पदस्थ डॉक्टरों के पास इलाज की सुविधा न होने से ऐसे मरीजों को तत्काल मुरैना रैफर कर दिया जाता है। अधिक झुलसे मरीज कई बार रैफर होने के दौरान रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं, क्योंकि कैलारस से मुरैना पहुंचने में करीब दो घंटे का समय लग जाता है। इस दौरान मरीज तड़पता रहता है।

50 किलोमीटर दूर से भी इलाज कराने आते हैं मरीज

कैलारस अस्पताल में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा धोधा, पहाड़गढ़ आदिवासी क्षेत्र के 50 किलोमीटर दूर क्षेत्र के अलावा चिन्नौनी, सुजर्मा, पनिहारी, कोटसिरथरा, पचोखरा तक के मरीज इलाज के लिए आते हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में कैलारस अस्पताल को ही बड़ा अस्पताल माना जाता है। पचोखरा भर्रा में भी अस्पताल है, लेकिन अव्यवस्थाएं होने से यहां पर मरीजों ने ही जाना बंद कर दिया है। जिससे कैलारस में मरीजों की लाइन लग जाती हैं।

बीते 2 साल में करीबन 50 व्यक्ति झुलस कर अस्पताल पहुंच चुके हैं, जिनमें से 12 व्यक्तियों की मुरैना रेफर करते समय मृत्यु हो चुकी है एवं कुछ लोगों का इलाज मुरैना ग्वालियर में संभव हुआ है। मार्च 2018 में ग्राम माधोगढ़ में भारती पुत्री रमेश चंद्र जाटव चिमनी से लगी आग से झुलस गई थी, जिसे कैलारस में लाया गया, यहां से उसे रैफर किया गया परंतु उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था। इसी तरह अप्रैल 2019 में बंसल स्वीट हाउस पर लगी अचानक आग में वहां पर काम करने वाले चार युवक झुलस गए थे, उन्हें कैलारस अस्पताल लाया गया परंतु यहां पर व्यवस्था न होने पर उन्हें मुरैना एवं ग्वालियर के लिए रैफर किया गया, जहां जाकर उनका इलाज संभव हुआ। वहीं कैलारस की अयोध्या बस्ती में रहने वाले बटा शाक्य दिसंबर 2019 में ट्रैक्टर की टंकी वेल्डिंग करते समय काफी झुलस गया था, कैलारस अस्पताल में उसका इलाज संभव नहीं हुआ एवं उसे मुरैना रैफर करना पड़ा, जहां उपचार हुआ।

मुरैना पहुंचने में लगता है दो से चार घंटे का समय

सहसराम से मुरैना पहुंचने में 4 घंटे एवं कैलारस से मुरैना पहुंचने में 2 घंटे का समय लग जाता है। इस बीच में झुलसे हुए मरीज जलन के कारण तड़पता रहता है एवं उसे तत्काल अच्छा उपचार नहीं मिल पाता है। इसी कारण कभी-कभी वह मौत के आगोश में भी चला जाता है। बर्न युनिट स्थापित किए जाने की मांग क्षेत्रीय जनता द्वारा कई बार अधिकारियों से की गई है। परंतु किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। ताकि जले हुए मरीजों को इलाज के लिए मुरैना न ले जाना पड़े।

जले हुए मरीजों को रैफर करना हमारी मजबूरी है

डॉ. शोभाराम मिश्रा, ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर कैलारस

बीते 2 साल में हो चुकी हैं 50 घटनाएं, इसके बाद भी समस्या के हल पर नहीं दिया जा रहा ध्यान

कैलारस अस्पताल के बाहर लगी मरीजों की भीड़, यहां आसपास के ग्रामीण अंचल से आते हैं कई मरीज।
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