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बीमारी से गई शीला की आंखों की रोशनी, दो बार बीएड किया, अब नेत्रहीन बच्चों को दे रहीं शिक्षा

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 04:02 AM IST

Murena News - 12वीं पास करने के बाद सर में दर्द हुआ और शीला की वर्ष 1995 में आंखों की रोशनी चली गई। आगे पढ़ने का संकट लेकिन शीला ने हौसला...

Morena News - mp news sheela39s eyes illuminated twice beed twice now giving education to blind children
12वीं पास करने के बाद सर में दर्द हुआ और शीला की वर्ष 1995 में आंखों की रोशनी चली गई। आगे पढ़ने का संकट लेकिन शीला ने हौसला बरकरार रखा। ग्वालियर जाकर एक साल ब्रेललिपि सीखी। बीए पास करने के बाद बीएड (स्पेशल) की डिग्री ली। लेकिन लोग कमजोर न समझें इसलिए दोबारा नॉर्मल स्टूडेंट्स की तरह शीला ने दोबारा बीएड की परीक्षा पास की। अब अपने जैसे नेत्रहीन बच्चों को पढ़ा रही हैं।

शहर के इस्लामपुरा में रहने वाले किराना व्यवसायी मोहनलाल की बेटी शीला बांदिल ने दैनिक भास्कर से चर्चा करते हुए कहा कि-पढ़ाई ही एक ऐसी चीज है जो हर इंसान के काम आती है। यही वजह थी कि मैंने आंखों की रोशनी जाने के बाद भी पढ़ाई बंद नहीं की। माता-पिता से जिद करके ग्वालियर गई, वहां रहकर ब्रेललिपि सीखी। लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि मैं स्पेशल नीड स्टूडेंट्स कहलाऊं।

इसलिए दोबारा पढ़ाई कर नॉर्मल बच्चों की तरह बीएड की डिग्री हासिल की। बकौल शीला मेरा लक्ष्य सरकार नौकरी हासिल करना है। इसलिए शीला ने हाल ही में रेलवे का एग्जाम क्वालिफाई किया। संविदा शिक्षक वर्ग-2 की परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन भी भरा।

व्यक्ति व समुदाय की शिक्षा के प्रति जज्बे व ललक को दर्शाती कहानी...

हमारी बच्ची, किसी मामले में अन्य बच्चों से कमजोर नहीं

पढ़ाई-लिखाई के प्रति शीला के जज्बे को देखते हुए उसके पिता मोहनलाल व मां कटोरीदेवी भी उसकी इच्छा का सम्मान करते हैं। जब भी पढ़ने-लिखने, एग्जाम देने व नौकरी में इंटरव्यू देने की बात आती है। पिता सारा काम-धंधा छोड़कर उसके साथ चलते हैं। रविवार को भी वैश्य समाज के परिचय सम्मेलन में भावुक मां ने मंच से कहा कि मेरी बेटी की आंखों की रोशनी नहीं है। लेकिन उसके मन की रोशनी उसे आगे ले जा रही है। वहीं दृष्टिहीन शीला इन दिनों शहर के नेत्रहीन विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रही हैं। शीला ने बताया कि मैं नहीं चाहती कि मेरे जैसे छोटे-छोटे बच्चे अपने आपको कमजोर समझें। इसलिए उन्हें सिर्फ यही कहती हूं कि अपने अंदर हौसला समेटो और लक्ष्य तक पहुंचो।

गांव में स्कूल नहीं, ग्रामीणों ने खुद रखे शिक्षक, चंदा एकत्रित कर देते हैं वेतन, बाहर के स्टूडेंट़्स के लिए हर घर से पहुंचता है टिफिन

सरकारी मदद के इंतजार में नहीं मिली तो काजीबसई गांव के लोग खुद कर रहे मदरसे का संचालन

काजीबसई गांव में हाईस्कूल नहीं है। प्राइमरी व मिडिल स्कूलों में शिक्षा की स्थिति दयनीय है। इसलिए ग्रामीणों ने यहां संचालित मदरसे में खुद 5 शिक्षकों को रखा। उन्हें सैलरी देने के लिए हर महीने 30 से 35 हजार रुपए का चंदा एकत्रित करते हैं ताकि उनके बच्चों को उर्दू, अरबी व हिंदी की शिक्षा मिल सके। इतना ही नहीं मदरसे में बाहर से पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों के लिए ग्रामीण चाय-नाश्ता के साथ दो वक्त का भोजन भी हर घर से टिफिन पैक करके ग्रामीण ही पहुंचाते हैं। काजीबसई गांव में वर्ष 1996 से अब्दुल्ला बिन मसूद मदरसे का संचालन हो रहा है। लेकिन इस मदरसे को आज तक कोई भी सरकारी मदद नहीं मिलीं। इसलिए ग्रामीणों ने तय किया कि हम खुद अपने बच्चों को पढ़ाएंगे। मदरसे में पहले 4 शिक्षक रखे गए जो बच्चों को उर्दू-अरबी की तालीम देते थे। लेकिन गांव के पूर्व सरपंच हाजी मोहम्मद रफीक ने कहा कि धार्मिक शिक्षा के साथ मॉर्डन शिक्षा भी जरूरी है। इसलिए एक और शिक्षक को हिंदी, अंग्रेजी व मैथ्स पढ़ाने के लिए रख लिया। अब इन पांचों शिक्षकों को हर महीने दिया जाने वाला 30 से 35 हजार वेतन ग्रामीण आपस में चंदा एकत्रित करके देते हैं। इन दिनों मदरसे में 270 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं, इनमें से 35 बच्चे ऐसे हैं जो आसपास गांव से होकर अत्यंत गरीब हैं। कई बच्चों के माता-पिता नहीं हैं। जिनका पूरा खर्च भी ग्रामीण उठा रहे हैं।

घर के बाहर रख देते हैं टिफिन, एक ग्रामीण की ड्यूटी, उन्हें उठाकर ले जाता है मदरसा

मदरसे में रहने वाले 35 से अधिक गरीब बच्चों के लिए जहां ग्रामीण सुबह चाय के लिए दूध खुद भेजते हैं। वहीं दोपहर व शाम के वक्त उनके भोजन का इंतजाम भी ग्रामीण करते हैं। सुबह व शाम गांव के संपन्न लोग टिफिन बनाकर दरवाजे पर रख देते हैं। गांव में रहने वाले बन्ने स्याह प्रतिदिन इन टिफिन को एकत्रित करके मदरसा भेजते हैं। इसके लिए बन्ने स्याह को ग्रामीण दो हजाार रुपए चंदा करके हर माह देते हैं।

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