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बैंक बैंक ना रहा, रुपया रुपया ना रहा, आरबीआई हमें तेरा ऐतबार ना रहा...

एक वर्ष पहले
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यस बैंक फेल होने पर साहित्य सभा की काव्य गोष्ठी कवियों ने किए व्यंग

बैंक बैंक ना रहा, रुपया रुपया ना रहा। आरबीआई हमें तेरा ऐतवार ना रहा। यह व्यंग सोमवार को साहित्य सभा की मासिक काव्य गोष्ठी साहित्यकारी यतेन्द्र सिंह सिकरवार ने यस बैंक के फेल होने पर किया। काव्य गोष्ठी में शहर के एक दर्जन से अधिक कविगण शामिल हुए। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्कार शंकर सिंह तोमर ने की। काव्य गोष्ठी का आयोजन बसंत आगमन पर किया गया।

गोष्ठी के प्रारंभ में डॉ कैलाश सुमन ने सरस्वती वंदना से किया। इसके बाद रविराज चौहान ने बेटी बचाओ, बेटी बचाओ पर रचना पढ़ते हुए कहा कि होते हैं बदनसीब वे, जिनके न बेटियां। बर्बाद उनकी जिंदगी, मारे जो बेटियां। इसी क्रम में संजेश शर्मा ने नारी की अग्नि परीक्षा पर व्यंग्य पढ़ा कि आग में जल के जलना पड़ेगा अभी। धूर्त रावण से छलना पड़ेगा अभी। तुम हो सीता तुम्हारा दोष है यही, वन को फिर से निकलना पड़ेगा अभी। रवि तोमर ने प्रकृति की मार को लक्ष्य कर कहा कि दाता तूने भेज दी, ये कैसी सौगात। सपनों को भी खा गई, ओलों की बरसात। रामू बैठा मेंढ़ पर, चेहरा लिए उदास। अब समझा रहमान ने क्यों खाई सल्फास। अब्दुल रहमान अब्बासी ने राजनेताओं को खबरदार करते हुए नज्म पढ़ी कि हिन्दू भी चाहिए मुसलमान भी चाहिए। गीता और कुरान का सम्मान भी चाहिए।

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