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400 वर्ष पहले प्राकृतिक रंगों से खेलते थे होली, त्वचा के लिए थे होते सुरक्षित
रंगों के पर्व रंग पंचमी पर प्राकृतिक रंगों व अबीर-गुलाल का प्राचीन काल से ही अपना महत्व रहा है। जो आज के रंगों की तुलना में त्वचा के लिए फायदेमंद भी होते थे।
अश्विनी शोध संस्थान के अध्यक्ष डॉ. आरसी ठाकुर ने बताया करीब 400 वर्ष पहले मुगल-मराठा काल में बड़े-बड़े बर्तनों में पलाश व आल के वृक्षों के फल व जड़ों से प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते थे। पलाश से जहां केसरिया रंग तैयार होता था। वहीं आल के फल से लाल व जड़ों से पीला रंग बनता था। वहीं हल्दी को पीस का गुलाल तैयार की जाती थी। उज्जैन की गुलाल आज भी प्रसिद्ध है। यह सभी प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए लाभदायक होकर चर्मरोधक थे। वही सर्दी के बाद गर्मी के आगमन से मौसम बदलाव पर यह रंग होली/रंग पंचमी खेलने के बाद त्वचा की सुरक्षा करते थे, जबकि आज के केमिकल युक्त रंग दुष्प्रभाव किसी से छुपा नहीं है।
30 किलो वजनी पात्र, तांबे की होती पिचकारी
रंगों को तैयार करने में करीब 30 वजनी घड़ेनुमा तांबे के पात्रों का उपयोग किया जाता था। इसे उठाने के लिए आसपास कड़े भी लगे हैं। इनमें रंग तैयार होने के बाद चौड़े मुंह के पात्रों में रखा जाता था। इसके साथ तांबे से बनी पिचकारी भी है। इसके मुंह पर हाथी की आकृति बनाई गई है। कई पात्रों पर कृष्ण लीला के दृश्य उकेरे गए है। कलात्मक चम्मच व कलश भी है। जो सूखे रंग लेने व गीले रंग को फेंकने में उपयोग होता था। यह सभी पात्र डॉ ठाकुर के संग्रहालय में सुरक्षित है।
519 वर्ष पुरानी पेंटिंग में दर्शाया
प्राकृतिक रंगों को तैयार करने का दृश्य आज से करीब 519 वर्ष पहले के चित्रकारों ने उकेर हुआ है। इसमें पात्रों में रंग तैयार करते हुए दिखाया गया है। डॉ. ठाकुर ने बताया कि यह पेंटिंग फ्रांसिसी ग्रंथ में नियामत नामा में प्रकाशित हुए है, जो लंदन के म्यूजियम में रखे है। जो दर्शाते है कि उस समय सौंदर्य तेल, लेप भी इसी प्रक्रिया से बनते थे।
कलात्मक चम्मच व कलश
पेंटिंग
रंग बनाने के पात्र दिखाते डॉ. ठाकुर