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कारगिल युद्ध के समय लिखी कविता आज मंच से सुनाएंगे

एक वर्ष पहले
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मां तेरी दुअा के दम से... अांचल की हवा के दम पे.... बर्फीली चट्टानाें पर बारूद काे उगाया है, परिंदा भी जहां पर ‘पर’ नहीं मार सके। उस जगह जाकर भी तिरंगा फहराया है...।

रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर शुक्रवार काे एमजी राेड पर हाेने वाले कवि सम्मेलन में काेटा के जगदीश साेलंकी वीर रस की इन पंक्तियों से शहीदों अाैर सीमा पर तैनात सैनिकों काे सलाम करेंगे। गुरुवार काे वे बीकानेर के एक कवि सम्मेलन में थे। वहां मंच संभालने से पहले उन्हाेंने भास्कर से यह पंक्तियां साझा की। सोलंकी ने कहा- सैनिक शीर्षक पर यह कविता उन्होंने कारगिल युद्ध के समय लिखी थी। उन्होंने बताया 40 सालाें से कवि सम्मेलन करते हुए वे अब तक करीब 500 बार यह कविता श्राेताअाें काे सुना चुके हैं। अाज दाेबारा वे यह कविता मंच से गुनगुनाएंगे। साेलंकी तिरंगा कविता से एकता का संदेश भी देंगे। वे सुनाएंगे कि मैं इस धरती की धड़कन... मैं मस्तक हूं हिमालय का... मैं मस्जिद की हूं मिनारे... मैं गुबंद हूं शिवालय का... मैं अाजादी की अादत हूं। देर रात चलने वाले कवि सम्मेलन में सत्यपाल सत्यम (मेरठ), शबाना शबनम (इंदाैर), दिनेश दिग्गज (उज्जैन), कुलदीप रंगीला (देवास) भी काव्य पाठ करंेगे। विशेष टेपा ताजपोशी स्वागत संचालन डाॅ. सुरेंद्र मीणा करेंेगे। सूत्रधार कवि जगन्नाथ विश्व हाेंगे।

टेपा सम्मेलन: काेटा के साेलंकी ने साझा की कविता

जगदीश सोलंकी
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