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सात साल बाद मिली कनूभाई गांधी स्मृति उपवन की गुम हुई फाइलजमीन पर कब्जा करने वालाें काे एसडीएम ने दिया नाेटिस, 19 को होगी सुनवाई

एक वर्ष पहले
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते कनूभाई गांधी की स्मृति में निर्मित उपवन की जमीन पर अवैध कब्जे से जुड़ी फाइल सात साल बाद ढूंढने पर राजस्व विभाग काे मिली है। मामले काे एसडीएम अार.पी. वर्मा ने दाेबारा खाेलकर कब्जा करने वाले दाे लाेग रमेश व बाबू काे नाेटिस जारी किया है। इसमें 19 मार्च काे सुनवाई हाेगी।

मामले की फाइल मिलने के बाद सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि आरटीआई कार्यकर्ता कैलाश सनाेलिया द्वारा शिकायत उपवन पर कब्जे काे लेकर की गई थी, लेकिन अधिकारियों ने मिट्टी उत्खनन में कार्रवाई कर मामला रफा-दफा कर दिया। इसके बाद से प्रकरण से जुड़ी फाइल राजस्व गलियाराें में गुम हाेकर रह गई थी। जब आरटीआई कार्यकर्ता ने प्रकरण से जुड़े अंतिम निर्णय की प्रतिलिपि मांगी, तब खुलासा हुआ कि फाइल गुम हाे चुकी है। 9 दिसंबर 2011 काे सनाेलिया द्वारा गांव नायन स्थित कनूभाई गांधी चेतना केंद्र की जमीन पर अतिक्रमण की शिकायत की थी। तत्कालीन कलेक्टर डाॅ. एम. गीता ने जांच एसडीएम संताेष टैगाेर काे साैंपी थी।

इतिहास से समझिए क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रकरण

कनुभाई उज्जैन जिले में पदयात्रा पर आए थे। 20 फरवरी 1986 को नागदा में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ था। उनकी स्मृति को चिरस्थायी रखने के लिए मप्र शासन ने कनूभाई चेतना केंद्र को गांव नायन में चंबल किनारे 5 एकड़ भूमि में फलदार पौधे लगाने के लिए आवंटित की थी। 23 जुलाई 1988 को चेतना केंद्र नायन समिति बनी। समिति के तत्कालीन अध्यक्ष गांधीवादी, स्वाधीनता सेनानी रामचंद्र नवाल की देख-रेख में फलदार पौधे लगाए। तहसीलदार ने 15 जुलाई 1988 को शासकीय भूमि उपलब्ध कराई थी। कनूभाई की प|ी आभा गांधी का नागदा आना-जाना बना रहा। 13 जून 1996 को समिति अध्यक्ष नवाल के निधन के बाद चांदमल बिसानी व श्यामादेवी यादव ने कार्य देखा था, लेकिन बिसानी के निधन के बाद धराेहर पर अतिक्रमण होना शुरू हुआ। यह उजड़ गई।

2013 में फाइल राजस्व गलियारों में दबी

जांच में अवैध उत्खनन की कार्रवाई कर मामला बंद कर दिया गया। 2013 में फाइल राजस्व गलियाराें में दब गई। अतिक्रमण नहीं हटने पर सनाेलिया ने 3 जून 2019 काे पूर्व की शिकायत पर की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी। जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने प्रथम अपील एडीएम डॉ. आर.पी. तिवारी के समक्ष प्रस्तुत की। आदेश के बाद 24 सितंबर 19 काे खुलासा हुआ कि शिकायत का प्रकरण दर्ज हुआ था, पर प्रकरण मिल नहीं रहा।

एक माह की जगह तीन माह में दी प्रतिलिपि

कलेक्टर शशांक मिश्र काे शिकायत करने पर उन्हाेंने मामले की दाेबारा से जांच करने और एक माह में शिकायत से जुड़े सारे दस्तावेज आरटीआई कार्यकर्ता काे उपलब्ध कराने काे कहा था। उसके बाद भी एक माह की जगह तीन माह बाद फाइल काे खाेजकर दस्तावेज उपलब्ध कराए गए। खास बात यह है कि यह फाइल नस्तीबद्ध प्रकरणाें में रखी हुई थी और रीडर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे थे।
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