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लुट जाएंगी कलियां ये खुद माली के हाथ से... कवि सोलंकी

एक वर्ष पहले
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कब तक वसुंधरा पे कोई इस तरह जीए, अपने वतन में ही जो पतन का जहर पीये। इस तरह न अमन वतन को है कभी मिला, चलता रहेगा ऐसे ही पतन का सिलसिला.. लुट जाएंगी कलियां ये खुद माली के हाथ से...शाखों की दुश्मनी हुई है पात-पात से।

कोटा राजस्थान के कवि जगदीश सोलंकी की कविता बदनाम बस्ती की इन्हीं पंक्तियों के लिए श्रोता शुक्रवार रात 12.15 बजे तक इंतजार करते रहे। भेरू चौक पर आयोजित नवयुवक मंडल द्वारा आयोजित 30वां टेपा सम्मेलन 10.30 बजे शुरू हुआ। शुरुआत भेरू महाराज की महाआरती के पश्चात कवियों को घोड़े व ऊंट की सवारी कराकर मंच तक लाया गया। टेपा सम्मेलन का शुभारंभ इंदौर से आई शबाना शबनम ने सरस्वती वंदना से किया। इसके बाद देवास के कुलदीप रंगीला ने अपनी हास्य व्यंग्य की रचनाओं से खूब समा बांधा। मेरठ के सत्यपाल सत्यम, उज्जैन के दिनेश दिग्गज ने अपनी रचनाओं से खूब दाद बटोरी। कोटा के जगदीश सोलंकी ने श्रोताओं की फरमाइश पर प्रसिद्ध कविता कारगिल सरहद का सिपाही सुनाकर श्रोताओं को देश प्रेम से ओतप्रोत कर दिया। सम्मेलन के प्रारंभ में अतिथियों ने उपस्थित श्रोताओं को होली की शुभकामनाएं दी तथा हास्य एवं टेपा सम्मेलन की प्रशंसा करते हुए नगर में स्वस्थ मनोरंजन के साथ साहित्यिक गतिविधियां संचालित करने पर आयोजकों की सराहना की। कार्यक्रम में राष्ट्रीय कवि व सूत्रधार जगन्नाथ विश्व, स्वागत संचालन डाॅ. सुरेंद्र मीणा एवं अतुल मालपानी का सम्मान किया गया। अतिथियों एवं कवियों को टेपा ताजपोशी मंडल संरक्षक प्यारेलाल पोरवाल, गोविंद लाल मोहता, मंडल अध्यक्ष महेंद्र बिसानी, बद्रीलाल पोरवाल आदि मंडल सदस्यों ने किया।

ये रहे मंचासीन - मुख्य अतिथि सांसद अनिल फिरोजिया, पूर्व विधायक लालसिंह राणावत, दिलीपसिंह शेखावत, मंडल अध्यक्ष सी.एम. अतुल, ग्रेसिम के जनसंपर्क अधिकारी संजय व्यास, एसडीएम आरपी वर्मा, सीएसपी मनोज र|ाकर, टीआई श्यामचंद्र शर्मा मंचासीन रहे।

भेरू चौक पर आयोजित 30वें टेपा सम्मेलन में मौजूद श्रोताओं को कोटा के जगदीश सोलंकी ने सुनाई कविता।

दामन में लिए बैठी हैं बदनाम बस्तियां

सोलंकी ने बदनाम बस्ती की जब आगे की पंक्तियां पढ़ी तो आयोजन स्थल तालियों से गूंज उठा। उन्होंने पढ़ा मिलती रहेगी धूल हवाओं के शोर में, गिरते रहेंगे फूल आंधियों से भोर में, लुट जाएंगी कलियां ये खुद माली के हाथ से, शाखों की दुश्मनी हुई है पात-पात से, यह दौर यहां खत्म कभी हो न पाएगा, यह दौर हमेशा वतन का सिर झुकाएगा, इस दौर के जज्बात में एक जात बनी है, सौगात साहूकारों की एक रात बनी है, चांदी सी चमकती हे ये अनजान हस्तियां, दामन में लिए बैठी हैं बदनाम बस्तियां।
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