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कभी पहचान थी मूर्तिकला, अब गिने चुने कलाकार

भास्कर संवाददाता| नरसिंहगढ़ कुछ दशक पहले तक शहर की मूर्तिकला यहां की खास पहचान हुआ करती थी। पत्थरों की मालवा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 04, 2018, 03:00 AM IST

भास्कर संवाददाता| नरसिंहगढ़

कुछ दशक पहले तक शहर की मूर्तिकला यहां की खास पहचान हुआ करती थी। पत्थरों की मालवा शैली में बनाई जाने वाली इन मूर्तियों के कलाकार स्थानीय होते थे। लेकिन अब उनकी संख्या बहुत सीमित रह गई है। यह व्यवसाय भी अब अंतिम दौर में है।पत्थरों की कमी आ गई है और शासन स्तर से वाजिब सहयोग भी कलाकारों को नहीं मिल पाया है, इसलिए मेहनत के हिसाब से कीमत मिलने में आती दिक्कतें देखकर ज्यादातर कलाकार मजदूरी करने लगे हैं। कुछ ने बदलते वक्त के साथ तालमेल बैठाया और खुद मूर्ति बनाने के साथ-साथ राजस्थान से भी छोटी मूर्तियां लाने लगे हैं, लेकिन यह संख्या बहुत नहीं है।

कला

शहर का ख़ास व्यवसाय हुआ करता था पत्थरों का शिल्प, जिसके नाम पर एक पूरा बाजार ही बसाया गया था

व्यवसाय इतना खास था कि पूरा बाजार और एक बस्ती बस गई थी

रियासती दौर में शुरू हुआ यह व्यवसाय आजादी के बाद भी काफी फला-फूला, लेकिन पिछले करीब 2 दशक से इसकी हालत खराब है। शांति धाम मार्ग के किनारे पर पत्थर बाजार के नाम से एक पूरा बाजार ही बसाया गया था, जो अब एक बेहद बेतरतीब जगह बन चुकी है और पत्थरों का धंधा सिमटकर इस बाजार के एक कोने में आ गया है। पत्थरों का काम करने वाले शिल्पियों की एक पूरी बस्ती वार्ड नंबर 3 में किले की पहाड़ी के नीचे बसाई गई थी। इसके भी अब गिने-चुने परिवार बचे हैं।

स्थानीय कलाकारों की बनाई पत्थर की देव प्रतिमा।

दूसरी कलाएं भी अंतिम दौर में

मिट्टी के बर्तन, खजूर की चटाइयां,पंखे और दूसरे सामान, लाठियां तैयार करने जैसे हस्तशिल्प शहर की खास पहचान थे। लेकिन यह सब अभी अंतिम दौर में हैं।

इसलिए पिटा व्यवसाय

कलाकारों को किसी भी स्तर से मदद नहीं मिलना इसकी बड़ी वजह रही। पत्थरों का काम करने वाले अधिकांश पुराने कलाकारों को फेफड़ों की बीमारियों ने चपेट में ले लिया। लेकिन उन्हें ना समय पर सही इलाज मिल पाया न ही उनके परिजनों को आर्थिक मदद मिल पाई। इस वजह से परिवार के दूसरे लोगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी भी नहीं ली।

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