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ईश्वर की प्राप्ति में बड़ी बाधा है अहंकार

भास्कर संवाददाता| नरसिंहगढ़ श्री सद्गुरु आश्रम में चल रहे साप्ताहिक सद्गुरु महोत्सव में शुक्रवार रात को हुए...

Danik Bhaskar | Mar 04, 2018, 03:05 AM IST
भास्कर संवाददाता| नरसिंहगढ़

श्री सद्गुरु आश्रम में चल रहे साप्ताहिक सद्गुरु महोत्सव में शुक्रवार रात को हुए धार्मिक सत्संग और पंच पदी में वक्ताओं ने जीवन में सद्गुरु के महत्व, उनके जरिए मोक्ष मार्ग में मिलने वाली सहायता और ईश्वर के अवतारवाद की व्याख्या की। मानस मधुकर कपिल कुमार ने कहा कि ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा अहंकार है।

भगवान और अभिमान कभी भी एक जगह पर नहीं रहते हैं। उन्होंने शबरी और केवट के उदाहरण देते हुए बताया कि शबरी की भक्ति समर्पण वाली थी, जबकि केवट की भक्ति में ज्ञान था। इसी वजह से शबरी को प्रभु के चरण पखारने का मौका सहज मिल गया, जबकि केवट को बहुत मुश्किल से प्रभु के चरणों को हाथ लगाने का मौका मिला। भगवान की लीला में यह दोनों प्रसंग अहंकार के नाश के प्रतीक के रूप में आते हैं। यह भी कहा कि ज्ञान मनुष्य को ईश्वर बनाता है ,जबकि भक्ति ईश्वर को भी मनुष्य बना देती है ।सच्चा भक्त प्रभु से कभी न कुछ मांगता है, न ही शिकायत करता है। अपने कर्तव्य का पालन किए जाता है। इस मौके पर भागवत कथा प्रवक्ता पंडित मनोज मेहता ने भी उद्बोधन दिया।

सद्गुरु महोत्सव

वक्ताओं ने जीवन के विकास में गुरु के महत्व और ईश्वर के अवतारवाद की व्याख्या की

जैसा दायित्व, वैसा अवतार लेते हैं परमात्मा

सत्संग के पहले सत्र में आश्रम के संचालक पंडित बलभीम तोवर ने भगवान के अवतारवाद की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि परमात्मा घट घट वासी हैं और वे संसार के हर जीव का ध्यान रखते हैं ।उन्होंने अवतारवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि भक्त के भाव की रक्षा और संसार में धर्म सिद्धांतों की स्थापना के लिए प्रभु जैसा दायित्व होता है ,उस वेश में अवतार लेते हैं। उन्होंने जरूरत पड़ने पर संत नामदेव के घर 36 वर्षों तक पानी भरने वाले की भूमिका निभाई तो दूसरी तरफ वे वराह और कच्छप अवतार तक लेते हैं ।यही संसार का सार है कि यहां कर्म करते ही जाना है।