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‘गरीब अभाव तो अमीर प्रभाव के लिए रोता है’

2 वर्ष पहले
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गरीब अभाव व अमीर प्रभाव के लिए रोता है। लेकिन दोनों सदाचार, शिष्टाचार, संस्कार को जीवन में आत्मसात नहीं करते हैं। धर्म तत्व बिना जीवन अधूरा होता है, राग, द्वेष मोह माया क्रोध के त्याग बिना धर्म भी सफल नहीं होता है। धर्म तत्व कर्म सत्ता से लड़ने की ताकत, क्षमता और आत्म शांति प्रदान करता है।

यह बात साध्वी गुणरंजना श्रीजी ने शक्तिनगर स्थित शंखेश्वर पार्श्व पदमावती धाम परिसर चातुर्मास धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि अपने बड़ों के प्रति आदर भाव होना चाहिए। जहां प्रेम है, वहां त्याग सरल बन जाता है। धर्म सत्त करें तभी फल मिलता है। अपनी इच्छा से गरीबों को अपनाना चाहिए। हमारे विचार दृष्टि इतने बेचैन है कि मन भटकता रहता है। हम 48 मिनट की सामयिक की आराधना में ध्यान पूर्वक नहीं बैठ सकते हैं। तत्व बोध बहुत विस्तृत है। हमारे विचार भावना एक-दूसरे के प्रति राग, द्वेष से भरे हुए हैं। धन, माया, झाल में उलझ कर मनुष्य शिष्टाचार भूल गया।

साध्वी श्रीजी ने कहा कि अपने को उन्नत बनाने के लिए पुरुषार्थ किया, लेकिन धर्म तत्व पर ध्यान नहीं दिया। इस दौलत पर अंहकार मत करो, एक पल में कुछ भी हो सकता है। मोबाइल, फेसबुक, गुगल, इंटरनेट ने मनुष्य का सदाचार छुड़ा दिया है। जीवन कांटों का ताज है। शरीर से प्रेम करना सहज है, आत्मा से प्रेम करना कठिन है। इस अवसर पर श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थी।

शंखेश्वर पार्श्व पदमावती धाम परिसर में प्रवचन देती साध्वी गुणरंजना श्रीजी।

भास्कर संवाददाता | नीमच

गरीब अभाव व अमीर प्रभाव के लिए रोता है। लेकिन दोनों सदाचार, शिष्टाचार, संस्कार को जीवन में आत्मसात नहीं करते हैं। धर्म तत्व बिना जीवन अधूरा होता है, राग, द्वेष मोह माया क्रोध के त्याग बिना धर्म भी सफल नहीं होता है। धर्म तत्व कर्म सत्ता से लड़ने की ताकत, क्षमता और आत्म शांति प्रदान करता है।

यह बात साध्वी गुणरंजना श्रीजी ने शक्तिनगर स्थित शंखेश्वर पार्श्व पदमावती धाम परिसर चातुर्मास धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि अपने बड़ों के प्रति आदर भाव होना चाहिए। जहां प्रेम है, वहां त्याग सरल बन जाता है। धर्म सत्त करें तभी फल मिलता है। अपनी इच्छा से गरीबों को अपनाना चाहिए। हमारे विचार दृष्टि इतने बेचैन है कि मन भटकता रहता है। हम 48 मिनट की सामयिक की आराधना में ध्यान पूर्वक नहीं बैठ सकते हैं। तत्व बोध बहुत विस्तृत है। हमारे विचार भावना एक-दूसरे के प्रति राग, द्वेष से भरे हुए हैं। धन, माया, झाल में उलझ कर मनुष्य शिष्टाचार भूल गया।

साध्वी श्रीजी ने कहा कि अपने को उन्नत बनाने के लिए पुरुषार्थ किया, लेकिन धर्म तत्व पर ध्यान नहीं दिया। इस दौलत पर अंहकार मत करो, एक पल में कुछ भी हो सकता है। मोबाइल, फेसबुक, गुगल, इंटरनेट ने मनुष्य का सदाचार छुड़ा दिया है। जीवन कांटों का ताज है। शरीर से प्रेम करना सहज है, आत्मा से प्रेम करना कठिन है। इस अवसर पर श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थी।

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