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‘संयम बिना आत्मा का कल्याण नहीं’

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2019, 04:05 AM IST

Neemuch News - नीमच. संयम बिना आत्मा का कल्याण संभव नहीं है। तप, त्याग, उपवास से मिलकर बड़ा पुण्य बन जाता है और मानव की आत्मा पवित्र...

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नीमच. संयम बिना आत्मा का कल्याण संभव नहीं है। तप, त्याग, उपवास से मिलकर बड़ा पुण्य बन जाता है और मानव की आत्मा पवित्र हो जाती है। मानव शुभ कार्यों को ज्यादा टालता है जबकि अशुभ कार्यों को टालना चाहिए ताकि पाप कर्म कम हो। शुभ कर्म से पुण्य का बैलेंस बढ़ता है। मनुष्य पाप पुण्य में अंतर करे ।

यह बात साध्वी अमी दर्शा श्रीजी ने जैन श्वेतांबर भीड़ भजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट द्वारा पुस्तक बाजार आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा 100 ओली की तपस्वी मृदृ पूर्वा श्रीजी का पुण्य कर्म आदर्श सम्मान योग्य कदम है। पश्चिमी संस्कृति का त्याग करें, भारतीय संस्कृति ज्ञान सिखाने वाली है। आयंबिल की तपस्या का धर्म लाभ लेना चाहिए। हमें संसार की संपति नहीं आत्मीय गुणों का विकास चाहिए। प्रतिदिन प्रार्थना करें कि हमें संयम कब मिलेगा। यदि हम इस जन्म में प्रार्थना करेंगे तो अगले भव में 8 वर्ष की आयु में ही चारित्र मोहनी कर्म को तोड़कर संयम को प्राप्त करेंगे। इच्छाओं पर ब्रेक लगाना भी संयम है। मानव में शुभ अशुभ इच्छा दोनों होती है। साध्वी आराधना पुण्य मसा. ने कहा श्रावक-श्राविका, साधु-साध्वी के माता पिता है। साध्वी जीर्णांगपूर्णाश्रीजी श्रीजी मसा के माता-पिता साध्वी वृन्द है। धर्मसभा में साध्वी चेतना पूर्णा श्रीजी का सान्निध्य मिला। गुरुवंदना विजय छाजेड़ ने की। आभार पारस लसोड़ ने माना। अमी पूर्णा श्रीजी व साध्वी जीर्णांगपूर्णाश्रीजी आदि ठाणा गुरुवार सुबह 6 बजे पुस्तक बाजार स्थित जैन मंदिर से धर्मनाथ पार्श्वनाथ जमुनियाकलां के लिए विहार करेंगी।

पुस्तक बाजार आराधना भवन में धर्मसभा को संबोधित करतीं साध्वीश्री।

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