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संतों के संग कथा सुनने और भक्ति का अनुसरण करने से भवसागर पार होता है

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 04:10 AM IST

Neemuch News - मां का हृदय भक्ति का स्वरूप है। भक्ति के लिए मंत्रों की नहीं मन की आवश्यकता होती है। सबरी को मात्र राम से प्रेम के...

Neemuch News - mp news by listening to stories with saints and following devotion the bhavsagar crosses
मां का हृदय भक्ति का स्वरूप है। भक्ति के लिए मंत्रों की नहीं मन की आवश्यकता होती है। सबरी को मात्र राम से प्रेम के कारण भगवान के दर्शन हुए। भगवान कृष्ण-राधा भक्ति की व्याख्या समझाते हुए कहा संतों के संग कथा सुनना व आत्म निवेदन जैसी भक्तियों का अनुसरण करने से भव सागर पार किया जा सकता है।

यह बात साध्वी हंसादेवी सरस्वती ने श्री पंचमुखी बालाजी मंदिर कानाखेड़ा में भागवत कथा में कही। उन्होंने कहा माता पिता की सेवा से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं। संसार में मोह ही दु:ख का कारण है। हिरणाकश्यप ने भक्त प्रहलाद को खूब प्रताड़ित किया लेकिन उसने प्रभु का स्मरण करना नहीं छोड़ा। राजा भरत मरते समय मोह हिरण के बच्चे में रहा तो अगला जन्म उनका हिरण के यहां हो गया था। इसलिए मरते समय मोह प्रभु भक्ति में ही रहे। नारायण की सेवा करेंगे तो लक्ष्मी स्वयं चली आएगी। सच्ची नारी वही है जिसके मन में पति का पहले सम्मान हो। जीवन में कष्ट हो तो गुरु को याद करना चाहिए, गुरु बिना ज्ञान नहीं मिलता है। हम किसी का धन उधार लेंगे तो वह वापस अगले जन्म में भी चुकाना पड़ता है। धन का सदुपयोग दान, पुण्य से होता है। संसार में मानव शरीर किराये का घर है। भागवत में राम सियाराम जय-जय राम.....गोविन्द मेरो है गोपाल मेरो राधा रमण नंदलाल मेरो है...मीरा तो सांवलिया में समाई गई रे....नंद और यशोदा नाचे भजनों की प्रस्तुति दी। कथाा में श्रीकृष्ण जन्म का प्रसंग सुनाया ताे पंडाल जयकारे से गूंज उठा। श्रीकृष्ण जन्म की झांकी आकर्षण का केंद्र रही। पंडाल को गुब्बारों, फूलाें से सजाया। बालकृष्ण का अभिनय 4 माह के नन्हे बालक रितिक श्याम नागदा ने किया।

तप से ही मनुष्य का जीवन संवरता है- पं. शर्मा

श्रीनाथ नगर स्थित शिव मंदिर परिसर में कथा के दौरान भजनों पर नृत्य करतीं महिलाएं।

भास्कर संवाददाता | नीमच

जीवन में तप जरूरी है, इससे मनुष्य का जीवन संवरता है। भले ही वह किसी भी रूप में हो। किसान द्वारा कृषि करना, माता-पिता की सेवा, दीन दुखियों की सेवा करना सब तप के ही रूप है। आज मनुष्य भंवरे की तरह हो गया है जो 5 इंद्रियों के वश में होकर सत्कर्म के मार्ग से भटक जाता है और ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। परमात्मा तो कण-कण में विद्यमान है, लेकिन उस ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को इंद्रियों पर नियंत्रण करना जरूरी है ।

यह बात पं. दशरथ शर्मा ने श्रीनाथ नगर स्थित शिव मंदिर परिसर में कथा के दाैरान कही। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य पुण्य कर जीवन का कल्याण करें। स्नान से शरीर, भागवत से आत्मा और मन पवित्र होता है। हम सुख में भगवान को याद करें तो दु:ख नहीं आते हैं। महाराज ने कहा कि संतान जब रोती है तो मां की ममता प्रकट हो जाती है। आत्मा ने मां को सहारा दिया तो अमर हो गई। परमात्मा में मां लगा तो परमात्मा बना। कथा वह जो जीवन में संघर्ष के साथ जीवन जीना सिखा दे। अभाव को आदत बना ले तो जीवन में सुख ही सुख मिल जाएगा। ज्ञान भक्ति वैराग्य को छोड़कर संसार सुख चाहता है जो संभव नहीं है। कथा में श्रीराम एवं श्रीकृष्ण जन्म का प्रसंग सुनाया तो आलकी की पालकी जय कन्हैयालाल की...जयकारे से पंडाल गूंज उठा।

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