अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

3 वर्ष पहले
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धर्म, समाज कुछ भी हो, शिक्षा के बल पर अच्छा मुकाम पाया जा सकता है। मन में दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो फिर कोई बाधा नहीं आ सकती। बांछड़ा समुदाय की नई पीढ़ी की युवतियों ने कुरीति की बेड़ियां को तोड़ बदलाव की नई तस्वीर पेश की है। बर्डिया की सोनालिका और नंदिनी बैंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर जॉब करते हुए 8 लाख रुपए सालाना का पैकेज पा रहीं। बात चाहे हाल ही में नायब तहसीलदार पद पर चयनित टीना मालवीय की हो या फिर मंदसौर में पदस्थ नर्स सोनू की, समाज की इस नई पीढ़ी ने परिवर्तन की दस्तक दे दी है। खास बात ये है कि अगले 2 साल में समाज की 250 से ज्यादा युवतियां स्वास्थ्य, तकनीक, शिक्षा के क्षेत्र में नाम कमाने को आतुर हैं। इसके पीछे परिवार ने बदलाव की ठानी तो पहले खासा विरोध झेलना पड़ा। अब सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं। महिलाएं गंदे धंधे के दलदल से दूरी बनाने लगीं। बच्चों को भी पढ़ाने लगे। नीमच जिले से यह शुरुआत हुई। मंदसौर-रतलाम मिलाकर 70 गांवों में समाजजन रहते हैं। जहां 22 हजार से ज्यादा की आबादी है।

कुरीति की बेड़ियां तोड़ पेश की बदलाव की तस्वीर; सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनकर सोनालिका व नंदिनी बैंगलुरु में पा रहीं 8 लाख रुपए सालाना पैकेज
मेहनत व शिक्षा से सब कुछ संभव है- सोनालिका
बर्डिया गांव में जिस जगह मेरा जन्म हुआ वहां समाज के 150 परिवार हैं। उन्हीं गली-मोहल्लों में बचपन बीता। जो माहौल था उसमें छेड़छाड़, रास्ता रोकने, गलत नजर से देखने जैसे हालात से गुजरना पड़ा था। कई बार इस तरह की घटना से परेशान होकर घर जाकर मां (पुष्पादेवी) को यह अब बताती। मां ने इसे इग्नोर करने की सीख दी। फिर मैंने यहां से ठाना कि कुछ बनना है। इंजीनियरिंग फील्ड में जाने का सोच रखा था। पिता विक्रम सोलंकी ने कम खेती होने के बाद भी बेटा-बेटी के बीच भेदभाव नहीं किया। साथ-साथ भाई नीतेश (जो अब पुलिस कांस्टेबल) ने भी पढ़ाई की। 12वीं तक की पढ़ाई मनासा के निजी स्कूल में हुई। हायर सेकंडरी के बाद इंदौर में 2 साल तैयारियां की। नीमसेट इंट्रेंस की कंपीटिशन एग्जाम फेस की, नतीजा आया तो ऑल इंडिया लेवल एससी में 24 वीं रैंक आई। पढ़ाई के बाद अब बैंगलुरु में जॉब कर रही हूं। ई-गवर्नमेंट फाउंडेशन लिमिटेड में सॉफ्टवेयर इंजीनियर (़डेवलपर्स) के तौर पर वर्तमान में 8 लाख रुपए सालाना का पैकेज है। मेरा यही कहना है कि मेहनत व शिक्षा से सब कुछ संभव है, शॉर्टकट से नहीं। (जैसा सॉफ्टवेयर इंजीनियर सोनालिका ने बताया)

इस भीड़ में हमारी पहचान कुछ नहीं थी, अब लगता है असंभव कुछ भी नहीं- नंदिनी
मेरा बचपन मनासा तहसील के बर्डिया में बीता। पढ़ाई के लिए पापा अमरलाल मालवीय रोज स्कूल तक छोड़ने आते थे। बाद में बस से आने-जाने लगे। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई तो समझ में आया कि लोग हमें क्यूं गलत नजरिए से देखते हैं। जबकि हम वैसे नहीं। इसलिए दु:ख होता था। कक्षा 10वीं, 12वीं बोर्ड में स्कूल में टॉप-3 में आते रहे। इससे हमारी स्कूल में अलग पहचान बनी। हमें देख समाज में ही अन्य बालिकाओं में भी पढ़ाई की ललक जागी। 12 बालिकाओं के परिजन को तो मैंने पढ़ाई के लिए राजी किया। मेरी मां मोना और नजदीकी रिश्तेदार पुष्पादेवी ने 10वीं के वक्त पूछा था ‘क्या बनना चाहती हो?’ तब मैनें तपाक से कहा था ‘इंजीनियर बनना है’। इंदौर में कंपीटिशन एग्जाम की तैयारियों के दौरान जब भी हम अन्य समाजों की प्रतिभाओं, अंग्रेजी भाषा ज्ञान को देखते थे तो लगता था कंपीटिशन के जमाने में हमारी पहचान कुछ नहीं। कमी खलती थी। ऐसे में हमारी हम उम्र लड़कियेां का मुझे पूरा सपोर्ट रहा। इसमें से समाज की ही करीब 10 युवतियां आज शिक्षक, नर्सिंग समेत अन्य फील्ड में हंै। सबने कहा एक दिन हम भी नाम कमाएंगी। अब लगता है असंभव कुछ नहीं। पढ़ाई से सब संभव हुआ। आज सब साकार हो चुका। बैंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं, 7 लाख प्रतिवर्ष का पैकेज है। (जैसा सॉफ्टवेयर इंजीनियर नंदिनी ने बताया)

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