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शरिया कानून उलझी हुई डोर की तरह है, इसमें कई विरोधाभास हैं

सत्य का संदेश दे वो धर्म है, प्रेम का उपदेश दे वो धर्म है, न्याय का निर्देश दे वो धर्म है कर्म का आदेश दे वो धर्म है’।

Bhaskar News | Last Modified - Nov 30, 2017, 05:28 AM IST

  • शरिया कानून उलझी हुई डोर की तरह है, इसमें कई विरोधाभास हैं

    भोपाल.‘सत्य का संदेश दे वो धर्म है, प्रेम का उपदेश दे वो धर्म है, न्याय का निर्देश दे वो धर्म है कर्म का आदेश दे वो धर्म है’। धर्म के बारे में यह विचार हैं रतलाम डिग्री कॉलेज में 40 साल तक राजनीति शास्त्र के सिद्धांत पढ़ाने वाले प्रो. अजहर हाशमी के। वे कहते हैं कि शरिया कानून एक उलझी हुई डोर की तरह है। इसमें बहुत विरोधाभास है। वहीं मुस्लिमों में अशिक्षा को लेकर चिंतित प्रो. हाशमी का कहना है कि हदीस में लिखा है- शिक्षा से आदमी की तरक्की के दरवाजे खुलते हैं। इल्म हासिल करने से सिर्फ नौकरी नहीं मिलती बल्कि जमीर रोशन होता है। जैसे आदमी नहाने के बाद तरोताजा हो जाता है वैसे ही इल्म हासिल कर ईमान और जेहन में ताजगी आ जाती है। धर्म दर्शन पर एक हजार से अधिक व्याख्यान दे चुके प्रो. हाशमी से विशेष बातचीत।

    विचार... क्रोध का बाजार बढ़ा है, इसलिए हमें क्षमा का प्रोडक्ट लाना होगा

    आपने ‘राम वाला हिंदोस्तान चाहिए’ कविता लिखी है। राम मंदिर के मुद्दे पर आप क्या राय रखते हैं?
    - मंदिर का मामला अदालत में है, इसलिए मैं इस पर कुछ कहना मुनासिब नहीं समझता। हालांकि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि बेहतर होगा सभी पक्ष आपसी सहमति से इस मुद्दे को सुलझाएं। यही मेरी भी राय है।
    असहिष्णुता, सांप्रदायिकता और सेक्युलरिज्म को आप कैसे देखते हैं?
    - असहिष्णुता या सामप्रदायिकता जैसा कोई माहौल नहीं है। यदि ऐसा होता तो क्या मैं गीता और वेद पर यहां व्याख्यान दे पाता। यह सियासी दांव-पेंच का मसला है। हकीकत से इसका कोई सरोकार नहीं। दरअसल, ‘क्रोध का बाजार इन दिनों बढ़ा हुआ है, इसलिए हमें क्षमा का प्रोडक्ट लाना होगा’।

    वंदे मातरम पर मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा सवाल उठाना कितना जायज है?
    - जो सवाल उठाते हैं, उन्हें इस्लाम की सही समझ ही नहीं है। इस्लाम में वतन से मोहब्बत की बात कही गई है। वंदे मातरम कोई पूजा तो है नहीं, वह तो मादरे वतन की तारीफ का गीत है।

    गीता और अद्वैत दर्शन पर व्याख्यान करते हुए कितना वक्त हो गया?
    - सभी धर्मों को जानने की जिज्ञासा बचपन से थी। पिता खुर्शीद अहमद सूफी संत और कुरान के हाफिज थे। हदीस, गीता और रामचरित मानस को उन्होंने समझा। उन्हीं से मुझे सभी धर्मों के मूल ग्रंथों को समझने की प्रेरणा मिली।

    रैपिड फायर

    तीन तलाक के मुद्दे पर आप क्या राय रखते हैं। क्या आप सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत हैं?
    - तीन तलाक एक गलत प्रथा थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मैं बहुत ही वाजिब, अनुकूल और मुनासिब फैसला मानता हूं।

    तो क्या आप मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या शरिया कायदों को नहीं मानते?
    - पर्सनल लॉ बोर्ड की राय से मैं इत्तेफाक नहीं रखता। शरिया कानून एक उलझी हुई डोर की तरह है। इसमें बहुत विरोधाभास है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस पर कोई बहस की गुंजाइश नहीं हैं।

    हिंदू धर्म से जुड़ी बातों पर विमर्श से आपके अपने मजहब के लोगों से कोई दिक्कत होती है क्या?
    - मैं किसी धर्म का विरोध तो करता नहीं हूं। बल्कि सभी धर्मों का मूल तत्व क्या है, यह लोगों को समझाता हूं। आखिर इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। बल्कि मुझे तो हर धर्म के लोगों से मोहब्बत और प्रेम ही मिला है।

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Web Title: Sharia Law Is Like A Complicated Door, Prof Hashmi
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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