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व्यापमं घोटाला: स्टूडेंट जानबूझकर एडमिशन नहीं लेते, ताकि सीट खाली रहें

Bhaskar News | Last Modified - Nov 26, 2017, 02:30 PM IST

एडमिशन के घोटाले की स्क्रिप्ट पहले से तय होती थी, 24 घंटे में होता था सारा खेल।
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    व्यापमं घोटाले में मेडिकल कॉलेजों के मैनेजमेंट और हेल्थ एजुकेशन डिपार्टमेंट के अफसरों के गठजोड़ ने तय प्लान के तहत सारा काम किया।

    भोपाल. मध्य प्रदेश के व्यापमं महाघोटाले में मेडिकल कॉलेजों के मैनेजमेंट और हेल्थ एजुकेशन डिपार्टमेंट के अफसरों के गठजोड़ ने तय प्लान के तहत सारा काम किया। कॉलेज एमबीबीएस की राज्य कोटे की सीट पर दाखिले में घोटाला करते थे। इसके लिए इन सीटों पर ऐसे स्टूडेंट्स को एडमिशन दिया जाता था, जो पहले से ही किसी दूसरे मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के स्टूडेंट थे। ये लोग काउंसलिंग के दौरान एडमिशन के लिए आते थे, लेकिन फिक्सिंग की वजह से आखिरी वक्त पर एडमिशन नहीं लेते थे। भोपाल के तीन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज- पीपुल्स, एलएन और चिरायु साथ ही इंदौर के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज मैनेजमेंट पर आरोप है कि वे ऐसी सीटों को पहले भरी हुई और बाद में खाली बता देते थे।

    चेयरमैन-डायरेक्टर-डीन का गठजोड़ था
    - व्यापमं महाघोटाले में पूरा गिरोह काम करता था। इसमें हेल्थ एजुकेशन डिपार्टमेंट के अफसरों से लेकर मेडिकल कॉलेज मैनेजमेंट के चेयरमैन, डायरेक्टर और डीन सभी का गठजोड़ था।

    - घोटाले के लिए सीट पर एडमिशन देने के लिए लाखों रुपए वसूलने के लिए बकायदा बिचौलियों की पूरी टीम थी।
    - चारों मेडिकल कॉलेज में बिचौलिए बैठकें करवाते थे। कॉलेज मैनेजमेंट के हौंसले इतने बुलंद थे कि राज्य कोटे की सीट पर गुजरात और कई दूसरे राज्यों के छात्रों को पैसा लेकर एडमिशन दे दिया गया।

    - मामले ने जब तूल पकड़ा तो एडमिशन एंड फीस रेग्युलेटरी कमेटी (एएफआरसी) ने मेडिकल कॉलेजों पर करीब 5 करोड़ की पेनाल्टी लगा दी थी।

    फैसले के खिलाफ कोर्ट पहुंचे कॉलेज
    - एएफआरसी के फैसले के खिलाफ चारों कॉलेज कोर्ट चले गए। सरकार की तरफ से कोर्ट में पक्ष कमजोर रखा गया। कॉलेजों को स्टे मिल गया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में फैसला सुनाया, जिसमें NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) को जायज माना। अब एएफआरसी ने अपना जवाब पेश किया है।
    - कॉलेज मैनेजमेंट और डायरेक्टर ऑफ मेडिकल एजुकेशन (डीएमई) ऑफिस के बीच इतना तालमेल था कि 30 सितंबर 2012 को काउंसलिंग खत्म हो गई, लेकिन एडमिशन की लिस्ट एमसीआई को 10 से 15 अक्टूबर तक भेजी गई। इस बीच पुरानी डेट के ड्राफ्ट लेकर ज्यादा पैसा वसूलकर सीट पर पुरानी डेट दिखाकर एडमिशन दे दिए गए।

    इन कॉलेजों पर आरोप

    पीपुल्स
    - इस मेडिकल कॉलेज में 2012 में एमबीबीएस की स्टेट कोटे की 63 सीट थीं। कॉलेज ने डीएमई को जानकारी दी कि 20 सितंबर 2012 को 54 सीट पर स्टूडेंट्स ने एडमिशन ले लिया है। इसके बाद दूसरी काउंसलिंग में खाली 11 सीट पर एडमिशन होना था।

    - जांच में ये सामने आया कि 5 आरोपी अनुराग वर्मा, मोहम्मद साजिद, ब्रजेश कुमार मिश्रा, मुकेश कुमार पटेल (असली नाम-संदीप कुमार) और वीरेंद्र कुमार पहले से उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस में एडमिशन ले चुके थे। इनका पीपुल्स में एडमिशन दिखाया गया।

    - कॉलेज ने डीएमई को जानबूझकर गलत जानकारी दी। कॉलेज का यह इरादा था कि उसे डीएमई से 30 सितंबर 2012 को खाली सीट पर नए स्टूडेंट्स के एडमिशन की छूट मिल जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को दरकिनार कर कॉलेज ने नए स्टूडेंट़स को एडमिशन दे दिया।

    - जांच में ये आया कि 4 आरोपी श्वेता जाधव, दीपेश दुबे, नेहा बत्रा और करिश्मा सिंघई ने बिचौलियों से मुलाकात की थी। इन चारों को मेडिकल कॉलेज ने राज्य की कोटा सीट पर 30 सितंबर 2012 को एडमिशन दिया था।
    - इन्हें डीएमई ने काउंसलिंग में सीट अलॉट नहीं की थी। कॉलेज ने खाली सीटों के लिए कोई एड नहीं दिया था। जांच में ये साबित हो रहा है कि परदे के पीछे छात्रों को बिचौलियों के जरिए सीट मिल गई।

    एलएन मेडिकल कॉलेज
    - जांच में यह सामने आया कि पटना में एमबीबीएस कर रहे 2011 के स्टूडेंट मिथिलेश कुमार ने स्कोरर का किरदार निभाया। मैनेजमेंट पर आरोप है कि बिचौलियों के जरिए ये स्कोरर और स्टूडेंट के साथ मिलकर एडमिशन देते थे। इन्होंने काउंसलिंग के दौरान डीएमई को सिर्फ 5 सीटें खाली बताईं, जबकि 40 से ज्यादा सीट खाली थीं।
    - इस तरह गलत दस्तावेज से 30 सितंबर 2012 को बिना एड दिए ही 40 सीटों पर नियमों को ताक में रखकर एडमिशन दे दिया। डीएमई डॉ. एनएम श्रीवास्तव ने जानकारी होने के बावजूद कॉलेज की गलत प्रॉसेस पर एडमिशन मंजूर कर दिया।

    चिरायु मेडिकल कॉलेज
    - मेडिकल कॉलेज ने 12 आरोपी (स्कोरर) को गलत एडमिशन दिया है। 25 सितंबर 2012 को जब काउंसलिंग की बैठक हुई तो ये सामने आया कि चैयरमेन डॉ. अजय गोयनका ने सिर्फ 9 सीट खाली बताईं, जबकि 50 से ज्यादा सीट खाली थीं। डीएमई को गलत जानकारी भेजी थी। कॉलेज ने सीबीआई को 28 सितंबर 2012 का एक लेटर सौंपा है। इसमें बताया गया है कि डीन के दस्तखत से डीएमई को लिखा गया था। पहली काउंसलिंग के दौरान कॉलेज से आरोपियों ने कोई जानकारी नहीं ली थी। यह लेटर डीएमई के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। कॉलेज ने डीएमई को 12 सितंबर 2012 को पहले लेटर में 63 में से 9 सीट खाली दिखाईं। डीएमई को गलत रिकॉर्ड भेजा गया।

    इंडेक्स कॉलेज
    - जांच में गवाही और दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि इंडेक्स मेडिकल कॉलेज ने 18 स्कोरर को एडमिशन देने की डीएमई को इन्फॉर्मेशन दी थी, जबकि एडमिशन नहीं दिया था। मेडिकल कॉलेज को 2012 में डीएमई ने स्टेट कोटा से एमबीबीएस की 95 सीट अलॉट की थीं।
    - कॉलेज एडमिशन कमेटी के चेयरमैन अरुण अरोरा ने डीएमई को इन्फॉर्मेशन दी कि 80 सीटों पर 21 सितंबर 2012 को एडमिशन दे दिया गया है। 24 सितंबर को 2 सीट अपग्रेड हुईं। दूसरी काउंसलिंग खाली 17 सीट पर की गई। ऐसे 18 स्कोरर थे, जिन्होंने कॉलेज में एडमिशन लेना दिखाया। ये थे- नितेश वर्मा, शिव प्रताप मौर्य, जितेंद्र बरसेना, परसाराम, शाकिर, नितेश सेनी, अनुज कुमार मौर्य, प्रभाकर चौधरी, जुबेर अहमद, कल्याण सिंह, राजदेव, कमाल अख्तर, मो. आसिफ, बुद्ध विलास सिंह, अभिषेक कश्यप, संजीव कुमार पटेल, अमित यादव और विनी कुमार सिंह।

    - इनमें से कुछ स्टूडेंट पहले से मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस के स्टूडेंट थे। कॉलेज यह बात छुपाकर डीएमई को जानकारी दी, क्योंकि उसे पता था कि 30 सितंबर को खाली सीट पर एडमिशन के लिए मंजूरी मिल जाएगी।


    चार्जशीट में भोपाल के 3, इंदौर के 1 मेडिकल कॉलेज का नाम
    पीपुल्स मेडिकल कॉलेज: चेयरमैन सुरेश एन. विजवर्गीय, उनके दामाद कैप्टन अंबरीश शर्मा, डीन वीके पांडे, मेंबर कॉलेज लेवल कमेटी एएन माशके, सीपी शर्मा, वीके रमन, पीडी महंत, एसके सरवटे, अतुल अहीर।

    इंडेक्स मेडिकल कॉलेज: चेयरमैन सुरेश सिंह भदौरिया, मेंबर कॉलेज लेवल एडमिशन कमेटी केके सक्सेना, पवन भारवानी, अरुण अरोरा, नितिन गोठवाल, जगत रॉवल।

    चिरायु मेडिकल कॉलेज: चेयरमैन डॉक्टर अजय गोयनका, डीन वी. मोहन, कॉलेज लेवल एडमिशन कमेटी के डॉक्टर रवि सक्सेना, एसएन सक्सेना, वीएच भावगार, एके जैन, विनोद नारखेड़े, हर्ष लनकर।

    एलएन मेडिकल कॉलेज: चेयरमैन जयनारायण चौकसे, एलएन मेडिकल के एडमिशन इंचार्ज डीके सतपथी, डीन डॉक्टर स्वर्णा बिसारिया गुप्ता।

    पंकज त्रिवेदी और उसकी पत्नी की टिकट बुक करवाता था तरंग शर्मा
    - चार्जशीट में बताया गया है कि नितिन महिंद्रा, पंकज त्रिवेदी और उसकी पत्नी के लिए फ्लाइट की टिकट प्लेनेट ड्रीम्स ट्रेवल एजेंसी चलाने वाल रैकेटियर तरंग शर्मा बुक करवाता था।

    सागर, शिल्पकार और संतोष गुप्ता इंजन-बोगी के मुख्य रैकेटियर
    - डॉ. जगदीश सागर, डॉ. संजीव शिल्पकार, संतोष गुप्ता ही इंजन-बोगी मॉडल के मुख्य रैकेटियर थे। पीएमटी 2012 में संतोष के हिस्से के इंजन-बोगी जब भोपाल में जगह नहीं बना सके, तो उन्हें शहडोल शिफ्ट किया गया।

    - एसटीएफ ने 587 लोगों में दो नाम दो बार लिखे थे एसटीएफ ने इस मामले में जिन 587 लोगों को नामजद किया था, उनमें दो आरोपियों के नाम दो बार लिखे थे। इस तरह से असली आरोपियों की संख्या 585 ही थी।

    डीएमई नहीं करते थे कॉलेजों के खिलाफ कार्रवाई
    - प्राइवेट मेडिकल कॉलेज डीएमई को जो लिस्ट भेजते थे, उसमें उन छात्रों का जिक्र होता था जो इंजन कैटेगिरी के थे। ये सीटें सरेंडर करने के बाद उस सीट पर दूसरे स्टूडेंट को बेच देते थे। परीक्षा फॉर्म के वक्त आने वाली लिस्ट से डीएमई पहले वाली लिस्ट का मिलान किए बिना यूनिवर्सिटी को भेज देते थे।

    आगे की स्लाइड्स में पढ़ें रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी...

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    2009 में महिंद्रा को कार गिफ्ट की थी सागर ने।

    2009 में महिंद्रा को कार गिफ्ट की थी सागर ने

    - सीबीआई ने चार्जशीट में बताया है कि व्यापमं घोटाले के सबसे अहम किरदार डॉ जगदीश सागर ने 2009 में महिंद्रा को कार गिफ्ट की थी। इसके अलावा भी समय-समय पर वह व्यापमं अफसरों को कई तरह के मंहगे गिफ्ट देता रहा था।
    - सीबीआई ने चार्जशीट में यह भी इशारा कर दिया है कि सागर और व्यापमं अफसरों के कई सालों से चले आ रहे रिश्ते यह साबित करते हैं कि इससे पहले की पीएमटी में भी बड़ी गड़बड़ी हुई हैं।
    - सागर का व्यापमं अधिकारियों पर किस हद तक प्रभाव था इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013 की पीएमटी में सागर द्वारा दिए गए सीटिंग अरेजमेंट को ही व्यापमं अधिकारियों ने जस का तस फॉलो किया था।

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    संघवी के स्कूलों में नियुक्त किए जाते थे दबंग पर्यवेक्षक

    संघवी के स्कूलों में अप्वॉइंट किए जाते थे दबंग सुपरवाइजर
    - पीएमटी परीक्षा के दौरान सॉल्वर्स की मदद करने के लिए एग्जाम सेंटर्स में ड्यूटी करने वाले सुपरवाइजर्स को भी मैनेज कर लिया जाता था।
    - इंदौर में तीन स्कूल चलाने वाले कांग्रेस नेता और गुजराती समाज के सचिव पंकज संघवी की भूमिका इसमें सामने आई है।
    - एग्जाम हॉल में दबंग इनविजिलेटर को तैनात किया जाता था, जो डॉ. जगदीश सागर से जुड़े होते थे। 2012 में हुई एग्जाम के दौरान तीनों स्कूलों में ऐसी गडबड़ी किए जाने के सबूत सीबीआई ने अदालत में पेश किए हैं।

    पंकज संघवी के इंदौर में हैं तीन स्कूल
    - पंकज संघवी के इंदौर में तीन स्कूल हैं। इन्हीं स्कूलों में बने एग्जाम सेंटर्स में इंजन-बोगी सिस्टम से नकल करवाई गई।
    - सागर ने कहा था कि वह उनके एग्जाम सेंटर्स में मनचाहे इनविजिलेटर भेजना चाहता है। पता चला है कि संघवी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।

    विजय नगर इंदौर के एड्रेस से भरे गए थे 8 फॉर्म
    - विजय नगर के मकान नंबर 234 के एड्रेस से 8 सॉल्वर के फॉर्म भरे गए थे। जांच में पता चला कि यह मकान जगदीश सागर का है। ऐसे ही ज्यादातर केसों में यह भी देखने को मिला कि 44 आरोपी छात्रों की फीस एक ही बैंक अकाउंट से भरी गई। अकाउंट होल्डर स्टेशनरी दुकान चलाने वाले हैं।

    ढूंढा तो इंजन-बोगी एक ही होटल में ठहरे मिले
    - भोपाल, इंदौर, शहडोल के 250 होटल के रिकॉर्ड की पड़ताल में पता चला कि सोनू पचौरी, केडी ओझा, सचिन यादव भोपाल के होटल राजा भोज में एक साथ ठहरे थे। आरोपी मिडिलमैन विकास सिंह होटल अंजालिका में मिले और उसके जुटाए स्कोरर भी वहीं ठहरे थे।

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    पंकज ने परीक्षा केंद्र 21 से घटाकर किए थे 14, आदेश के बाद भी नहीं कराई वीडियोग्राफी

    चार्जशीट के मुताबिक व्यापमं डायरेक्टर पंकज त्रिवेदी ने असिस्टेंट कंट्रोलर रचना त्रिवेदी को 13 मई 2012 को परीक्षा केंद्रों की संख्या कम करने का प्रस्ताव तैयार करने कहा, जबकि विज्ञापन 21 शहरों को परीक्षा केंद्र बनाने का था। संख्या घटाकर 14 की गई। इसमें धार, खंडवा और खरगोन को इंदौर में शामिल किया गया। विदिशा और होशंगाबाद को भोपाल में शामिल किया, लेकिन शहडोल को जानबूझकर अलग रखा गया, जबकि यह भी जबलपुर संभाग के अंतर्गत आता था। यह प्रस्ताव 23 मई को व्यापमं की चेयरपर्सन रंजना चौधरी ने मंजूरी किया। रंजना चौधरी ने आदेश दिया कि परीक्षा की वीडियोग्राफी कराई जाए और तीन स्तरों पर उम्मीदवारों का बायोमेट्रिक फिंगर प्रिंट व फोटो भी लिए जाएं। पंकज ने जानबूझकर इस आदेश पर अमल नहीं किया। पीएमटी 2012 में मेसर्स मेरिट्रेक सर्विस प्रा. लिमिटेड को बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट और फोटोग्राफी का काम मिला था, लेकिन पंकज और नितिन महिंद्रा ने कंपनी के अधिकारियों के साथ सहयोग नहीं किया। इसके बाद यह काम महिंद्रा के कहने पर मेसर्स सीएस डेटामेशन नई दिल्ली को दिया गया। कंपनी ने महिंद्रा व पंकज के कहने पर बायोमेट्रिक व फोटोग्राफी का काम नहीं किया। इसी वजह से 2013 में घोटाला उजागर होने पर कंपनी का भुगतान रोक दिया गया। सीके मिश्रा और महिंद्रा ने कहा कि चुनिंदा फॉर्म में जहां फोटो क्लीयर नहीं थे, उन्हें रिजेक्ट नहीं करने के लिए कहा।

    पर्टिकुलर लॉजिक के साथ जनरेट किए रोल नंबर
    - पंकज, महिंद्रा, अजय सेन, सीके मिश्रा ने पर्टिकुलर लॉजिक के साथ रोल नंबर जनरेट किए। इसके बाद इन्हें ऐसे आल्टर किया कि इंजन और बोगी की बैठक व्यवस्था मनमाफिक हो जाए।

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    जानिए घोटाले से जुड़े बड़े आरोपियों को

    जानिए घोटाले से जुड़े बड़े आरोपियों को

    सुरेश विजयवर्गीय, पीपुल्स ग्रुप

    - सुरेश विजयवर्गीय 70 के दशक में जुमेराती में किराने की दुकान चलाते थे। बाद में वे अपने एक दोस्त के साथ अमेरिका चले गए। वहां से लौटकर उन्होंने काजी कैंप के पास कैरियर ग्रुप के राजोरिया के साथ सुपर बाजार खोला, जो बाबरी मस्जिद के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा में आग की भेंट चढ़ गया। 1992 में उन्होंने सार्वजनिक जनकल्याण परमार्थिक न्यास की स्थापना की। आज पीपुल्स ग्रुप की अपनी यूनिवर्सिटी, डेंटल कॉलेज, मेडिकल कॉलेज के साथ ही कई एजुकेशन इंस्टीट्यूट हैं।

    विवादों से नाता

    2009 में आयकर छापे में खुलासा हुआ था कि शारजाह स्थित एक बैंक से पीपुल्स ग्रुप को 300 करोड़ ट्रांसफर हुए थे।

    अंबरीश शर्मा, पीपुल्स ग्रुप

    कैप्टन अंबरीश शर्मा पेशे से कमर्शियल पायलट हैं। मूलत: वह डबरा के पास टेकनपुर गांव के रहने वाले हैं। भोपाल प्रारंभिक पढ़ाई करना के बाद उन्होंने फ्लाइंग क्लब में एडमिशन लिया। इसी दौरान अंबरीश की मुलाकात विजयवर्गीय परिवार की बड़ी बेटी रुचि के साथ हुई। फिर दोनों ने शाादी कर ली। शादी के बाद अंबरीश ही मेडिकल कॉलेज का काम संभालने लगे। यहां सरकारी कोटे की सीटों पर एडमिशन के लिए बड़े रैकेटियर अंबरीश से ही संपर्क करते थे। अंबरीश पीपुल्स मैनेजमेंट के अहम सदस्य होकर मेडिकल कॉलेज के अलावा ग्रुप के दूसरे कामों में भी खाासा दखल रखते हैं।

    बढ़ता गया कद

    - रुचि विजयवर्गीय भी ग्रुप में खासा दखल रखती हैं। विजयवर्गीय के दामाद होने के कारण अंबरीश का कद ग्रुप में लगातार बढ़ता गया।

    सुरेश सिंह भदौरिया, इंडेक्स कॉलेज

    सुरेश सिंह भदौरिया एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माने जाने वाले पुलिस अफसर अशोक भदौरिया के भाई हैं। अपने भाई के नाम के बूते पुलिस महकमे में जान-पहचान बढ़ाई और शराब के कारोबारियों के संग जुड़ गए। इंदौर में एबी रोड पर अमलतास होटल बनाया। शराब के धंधे में आगे बढ़े। एक पूर्व डीजीपी से गहरे ताल्लुक हुए, जिसके बूते शराब का धंधा खूब फल-फूल गया। आईपीएस और आईएएस अफसरों से भी दोस्ती बढ़ती गई। पूर्व एमसीआई चेयरमैन केतन देसाई से अच्छे संबंध हो गए, जिससे कुछ अड़चनों के बाद कॉलेज की मंजूरी मिल गई। यहां से शराब के धंधे को छोड़कर चििकत्सा क्षेत्र में आए।

    चर्चा में इसलिए भी

    - सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के कई नौकरशाहों का पैसा भी भदौरिया के धंधे में लगा है। कुछ साल पहले ही मेडिकल कॉलेज खोला है।

    जेएन चौकसे, एलएन मेडिकल

    बिलासपुर में जन्मे जयनारायण चौकसे ने भारतीय स्टेट बैंक में बतौर क्लर्क सेवा में आए। भोपाल की सुल्तानिया रोड स्थित ब्रांच में रहे। इस दौरान वे शराब विक्रेता रंजीत जायसवाल के संपर्क में आए। दोनों ने भोपाल स्टेशन के एक नंबर गेट के सामने स्थित पुष्पा नगर और डीआईजी चौराहे के पास चौकसे नगर बसाया। इसके बाद रंजीत जायसवाल के साथ कल्चुरी एजुकेशन ट्रस्ट बनाया। इसके बैनर तले 1994 में भोपाल में लक्ष्मी नारायण कॉलेज अॉफ टेक्नोलॉजी कॉलेज की नींव रखी। चौकसे ने बिलासपुर, इंदौर, ग्वालियर में भी इंजीनियरिंग कॉलेज खोले।

    डॉ. अजय गोयनका, चिरायु

    डॉ. अजय गोयनका का भोपाल में प्रायवेट हेल्थ सर्विसेज बढ़ाने में बड़ा रोल है। चिरायु मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन डॉ. गोयनका ने एमबीबीएस और एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद सदर मंजिल के पीछे मालीपुरा में चिरायु अस्पताल खोला। चिरायु ग्रुप की 9 कंपनियां हैं। यह पेपर से लेकर एयर प्रॉडक्ट तक का कारोबार करती है।

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