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आधार से लिंक हो राजस्व रिकॉर्ड तो रजिस्ट्री होते ही हाे जाएगा नामांतरण

Bhaskar News | Last Modified - Nov 26, 2017, 07:11 AM IST

रजिस्ट्री होने के बाद संबंधित व्यक्ति को राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलवाने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं।
  • आधार से लिंक हो राजस्व रिकॉर्ड तो रजिस्ट्री होते ही हाे जाएगा नामांतरण

    इंदौर.अभी जमीन की रजिस्ट्री होने के बाद संबंधित व्यक्ति को राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलवाने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसा 1959 में बनी भू-राजस्व संहिता की लंबी प्रक्रिया के कारण होता है। पहले आवेदक को नामांतरण में आवेदन करना होता है फिर जमीन संबंधी पुराने सभी रिकॉर्ड लगते हैं। पटवारी की रिपोर्ट बुलाई जाती। तहसीलदार कोर्ट में सुनवाई होती। नामांतरण पर किसी को आपत्ति तो नहीं है इसकी सूचना जारी की जाती। आपत्तियों को सुनने के बाद ही राजस्व कोर्ट से जमीन नामांतरण के आदेश होते हैं। अब इस संहिता में बदलाव की तैयारी चल रही है, ताकि लोगों को लंबी प्रक्रिया से राहत मिल सके। इसके लिए शनिवार को मप्र भूमि सुधार आयोग के अध्यक्ष आईएस दाणी ने शनिवार को रम विभाग सभागृह में कमिश्नर, इंदौर संभाग के सभी कलेक्टर, एसडीएम, राजस्व वकील व जनप्रतिनिधियों से सुझाव लिए हैं।

    मांगा जाता है 1959 के पहले का भी रिकॉर्ड

    - राजस्व वकीलों की ओर से सुझाव दिया कि आवेदकों को लंबी प्रक्रिया से बचाने के लिए सभी राजस्व रिकॉर्ड को पहले आधार से लिंक कर दिया जाए। जब रजिस्ट्री हो तो इसकी जानकारी राजस्व कोर्ट में चली जाए और दस्तावेज में नए भू-स्वामी का नाम चढ़ जाए। यह भी बात उठी कि अधिकारी अभी भी 1925 के मीसल बंदोबस्त को देखते हैं।

    - इस पर दाणी ने भी माना यह गलत है 2 अक्टबर 1959 के पहले के रिकॉर्ड देखने की जरूरत ही नहीं है। दाणी ने भी माना कि संहिता की कई धाराएं अब अप्रासंगिक हो गई हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी सुझावों के आधार पर दिसंबर अंत तक वह शासन को रिपोर्ट सौंप देंगे।

    - इसके आधार पर शासन राजस्व संहिता में आवश्यक बदलाव करेगा। इस दौरान राजस्व वकील हेमंत फडके, डीजी पाठक, सुनील चौधरी, हेमंत मुंगी, अजय श्रीवास्तव अादि ने सुझाव दिए।

    ई-मेल और वाट्स एप से भी सूचना हो मान्य
    - यह भी सुझाव दिया गया कि पत्र तामील कर राजस्व कोर्ट में आरोपी और फरियादी को बुलाने में देरी होती है। इसलिए बेहतर होगा कि ई-मेल, वाट्सएप को भी मान्य किया जाए और इनसे सूचना जारी होने पर पक्षकारों का कोर्ट में हाजिर होना अनिवार्य किया जाए।

    राजस्व बोर्ड इंदौर, जबलपुर जैसे शहरों में भी हो
    - अधिकारियों ने सुझाव दिया कि अभी राजस्व बोर्ड सिर्फ ग्वालियर मे हैं, इससे सुनवाई में समस्या आती है। इंदौर, जबलुपर, रीवा जैसे बड़े-बड़े संभागों में इसे बनाया जाना चाहिए। साथ ही रिविजन के अधिकार कमिश्नर स्तर पर होना चाहिए। अधिकारियों ने राजस्व कोर्ट में पीठासीन अधिकारियों की सुरक्षा की भी बात कही। जजेज प्रोटेक्शन एक्ट में राजस्व कोर्ट की बात स्पष्ट होना चाहिए।

    अभी आवेदकों को इन मामलों में लग जाते हैं महीनोंडायवर्शन

    - किसी जमीन का आवासीय, व्यावसायिक या अन्य उपयोग करने से पहले भू स्वामी को इसकी मंजूरी लेना होती है। इसकी लंबी प्रक्रिया व विविध विभागों से एनओसी लगती है। दो माह का समय लग जाता है।
    नामांतरण
    - कोई भी खेती की जमीन लेने पर राजस्व रिकॉर्ड में खरीदार को अपना नाम दर्ज कराने में अभी पसीने आ जाते हैं। कई सारे रिकॉर्ड मांगे जाते हैं, यदि आपत्ति आ गई तो उनकी सुनवाई होती है, फिर नामांतरण होता है। इसके बाद भी पटवारी के चक्कर लगाकर ऋण पुस्तिका लेना होती है।

    बटांकन
    - यदि एक ही सर्वे नंबर की जमीन है, उसमें से किसी ने कोई टुकड़ा लिया है तो उसका बंटाकन होता है, इसमें जमीन का सीमांकन होगा फिर नक्शे पर जमीन कटेगी और राजस्व रिकार्ड में आएगा लंबी प्रक्रिया से फिर दो-चार होना होता है।

    राजस्व बोर्ड अपील
    - राजस्व कोर्ट से कोई फैसला विपरीत होने पर व्यक्ति को ग्वालियर राजस्व मंडल में अपील करना होती है, अभी एक ही बोर्ड है, इंदौर या अन्य शहरों में खुलने से परेशानी दूर होगी।

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Web Title: Revenue Records Linked From The Base Will Be Registered Only After The Registry
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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