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सांची दूध में मिला था सोडियम सल्फेट, हाई कोर्ट का नोटिस, कहा- गंभीर मामला,

नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में जवाब देने को कहा है। कोर्ट ने टिप्पणी भी कि दूध में मिलावट गंभीर मामला है।

Danik Bhaskar | Nov 22, 2017, 07:08 AM IST

इंदौर . सांची दूध में मिलावट की बातों पर अब स्टेट फूड लैब ने भी मुहर लगा दी है। सांची के मांगलिया प्लांट ले जा रहे टैंकर से दूध निकालने का भंडाफोड़ होने के बाद भेजे गए सैंपलों की जांच रिपोर्ट मंगलवार को आई। रिपोर्ट के अनुसार टैंकर के दूध में पानी मिला होने की पुष्टि हुई है। वहीं, दूध में मिलाने के लिए लाए गए पानी में खतरनाक केमिकल सोडियम सल्फेट मिला है। इधर, दूध में मिलावट और बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं किए जाने के मामले में हाई कोर्ट ने सरकार और सांची दुग्ध संघ को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में जवाब देने को कहा है। कोर्ट ने टिप्पणी भी कि दूध में मिलावट गंभीर मामला है।

- 31 अक्टूबर की रात मांगलिया दूध प्लांट में आने वाले टैंकर में मिलावट करने वाले गिरोह को शिप्रा पुलिस ने पकड़ा था। खाद्य औषधि विभाग ने 1 नवंबर को दूध, केमिकल और पानी के चार सैंपल लेकर भोपाल स्थित लैब को भेजे थे।

- इनकी जांच में खुलासा हुआ है कि सांची के टैंकर से लिए गए दूध में मिलावट थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दूध में सॉलिड नाॅट फैट (एसएनएफ) का न्यूनतम मानक 8.5 प्रतिशत होना चाहिए, जबकि टैंकर वाले दूध में यह 8.1 फीसदी पाया गया। आइशर में रखी टंकियों से लिए गए दूध की जांच में एसएनएफ का स्तर 7.4 प्रतिशत ही मिला।

तीन हफ्ते में देना होगा जवाब

- जस्टिस पीके जायसवाल, जस्टिस वीरेंदर सिंह की डिविजन बेंच के समक्ष इस जनहित याचिका की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी की ओर से अधिवक्ता मनीष यादव ने पैरवी की। याचिका में उल्लेख किया है कि सांची को एक विश्वसनीय ब्रांड माना जाता है, लेकिन इसमें दूध सप्लाई करने वाले ब्लैक लिस्टेड और मिलावट करने वाले कांट्रेक्टर जुड़े हुए हैं।

- दूध इकट्ठा करने वाले अधिकांश टैंकर ब्लैक लिस्टेड कांट्रेक्टर सुखविंदर के अटैच थे। उसके टैंकरों की सील टूटी हुई आती थी। सांची के गेट पर बैठने वाले स्टाफ ने सील टूटने, दूध का नमकीन स्वाद होने की शिकायत भी की, लेकिन सांची के बड़े अफसरों ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया।

- कांट्रेक्टर को कैमिकल सप्लाई करने वाले को भी पुलिस ने पकड़ा है। कांट्रेक्टर के टैंकर जीपीएस से कुछ समय के लिए दूर भी हो जाते थे। पुलिस ने भी टैंकरों को सुनसान स्थान पर ले जाने की पुष्टि की है। आरोपी ने ही स्थान बताए हैं। इतने सब घटनाक्रम बताते हैं कि सांची के अफसरों की मिलावट में मिलीभगत है। तीन सप्ताह के भीतर जवाब पेश होने के बाद याचिका पर दोबारा सुनवाई होगी।

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दूध में एसएनएफ कम होने का मतलब पानी की मिलावट
- खाद्य सुरक्षा अधिकारी जितेंद्र सिंह राणा ने बताया कि सॉलिड नाॅट फैट (एसएनएफ) दूध में फैट को छोड़कर पाए जाने वाले अन्य मूल तत्व होते हैं। इनमें न्यूट्रीशियंस होते हैं। इसका कम पाए जाने का मतलब दूध में पानी का मिला होना होता है।

- इस रिपोर्ट के आने के बाद सांची की जांच व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। सांची प्रबंधन द्वारा उक्त टैंकर से दूध के सैंपल लिए थे। सांची की लैब में दूध की जांच करने के बाद कहा गया था कि दूध में मिलावट नहीं थी। सांची ने विज्ञापन से प्रचारित भी किया था कि दूध में केमिकल नहीं है।

- सांची ने इस जांच के बाद उक्त दूध का इस्तेमाल भी रोज की सप्लाय में किया था।

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डिटर्जेंट में डलता है सोडियम सल्फेट
- जांच रिपोर्ट में सफेद पाउडर को सोडियम सल्फेट बताया गया है, जो डिटर्जेंट बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। इसे दूध में मिलाए जाने के लिए आयशर गाड़ी में टंकियों में जो पानी लाया गया था, उसमें भी मिला है। इस आधार पर लैब ने इसे एडल्ट्रेंट बताया है। यानी मिलावट करने में उपयोग किए जाने वाले पदार्थ।

हो सकती है पेट, किडनी, दिल की बीमारियां
- वरिष्ठ रसायन विशेषज्ञ डॉ. एसएल गर्ग के मुताबिक दूध में सोडियम सल्फेट मिलाने से गाढ़ापन बढ़ता है। इससे पेट, किडनी, दिल की गंभीर बीमारी होने का खतरा है।

हमें कई बार कम फैट वाला दूध मिलता है

स्टेट फूड लैब की रिपोर्ट में दूध में पानी की मिलावट मिली, जबकि आपकी जांच में इससे इनकार किया गया था?
- हमारी जांच में भी दूध में एसएनएफ का स्तर कम मिला था, लेकिन हमने दूध में केमिकल नहीं होने की बात कही।
पहले भी सांची में आने वाले दूध में एसएनएफ कम मिला था?
- कई बार ऐसा होता है। ऐसा उन क्षेत्रों से आने वाले दूध में भी पाया जाता है जहां गाय का दूध ज्यादा होता है।

, क्योंकि गाय के दूध में एसएनएफ कम होता है।
दूध में पानी मिला होने के बाद भी उसे खरीदकर सांची लोगों को क्यों बेचती है?
- जरूरी नहीं कि पानी मिला होने से ही दूध में एसएनएफ कम हो। इसके और भी कारण होते हैं। हम जो दूध खरीदते हैं, उसे सीधे नहीं बेचते। उसे एफएसएसएआई के मानकों के अनुरूप करने के बाद बाजार में पहुंचाया जाता है।