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बेटा-बेटी में फर्क नहीं, प्रेम से रहो; बेटियों को करो शिक्षित

बेटा नहीं होने से नाराज पति द्वारा विवाद करने से प|ी ने घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया था। शनिवार को आयोजित लोक अदालत...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 11, 2018, 04:40 AM IST

बेटा-बेटी में फर्क नहीं, प्रेम से रहो; बेटियों को करो शिक्षित
बेटा नहीं होने से नाराज पति द्वारा विवाद करने से प|ी ने घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया था। शनिवार को आयोजित लोक अदालत में न्यायाधीशों व अधिवक्ताओं ने समझाया कि बेटा और बेटी में फर्क नहीं रह गया है। प्रेम से रहो बेटे की कमी महसूस नहीं होगी। बेटियों को शिक्षित करो। इसके बाद पति-प|ी ने सुलह कर फिर साथ रहने का निर्णय लिया।

धनोरा निवासी कालू पिता मंशाराम की शादी राधाबाई लालू से हुई थी। दोनों की चार बेटियां है। बेटा नहीं होने से कालू विवाद करता था। इससे प|ी ने न्यायालय में पति, देवर और सास के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया था और मायके में रहने लगी थी। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश कृष्णा परस्ते एवं न्यायाधीश जफर खान ने समझाईश देकर कहा बेटा और बेटी समान है। इस पर दोनों ने साथ रहने का फैसला किया। न्यायाधीशों ने दोनों को पौधे दिए। इस दौरान राधाबाई की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता वरूण चौहान, कालू की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता हरी बालीचा और सुलहकर्ता अधिवक्ता विमला शर्मा मौजूद रही।

धनोरा निवासी पति-प|ी के साथ न्यायाधीश। (सफेद शर्ट में पति एवं पास में गुलाबी साड़ी में प|ी)

...और इधर, घरेलू हिंसा के मामले में पति-प|ी में हुई सुलह

इसी तरह घरेलू हिंसा के एक अन्य मामले में पति-प|ी में सुलह हो गई। सायरा बी का विवाह पांच साल पहले पलसूद के नासीर शेख से हुआ था। दोनों के बीच विवाद होने से सायराबी मायके सेंधवा आकर रह रही थी।

घरेलू हिंसा का मामला पति और सास के खिलाफ लगाया था। अधिवक्ता मो. हुसैन खान और एहमद हुसैन खान ने मामला लोक अदालत में रखवाया। न्यायाधीश उत्तम कुमार डार्वी ने समझाईश दी। इसके बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया। न्यायालय परिसर में सुबह 11 बजे लोक अदालत की शुरूआत हुई। इस दौरान प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश उदयसिंह मरावी, द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश कृष्णा परस्ते, न्यायाधीश उत्तमकुमार डार्वी, जफर खान सहित अधिवक्ता व अन्य मौजूद थे। न्यायाधीशों ने बताया लोक अदालत के माध्यम से समझौता योग्य प्रकरणों का सुलह से निराकरण होता है। इससे पक्षकारों और न्यायालय के समय, धन एवं श्रम की बचत होती है। पक्षकारों को त्वरित न्याय मिलता है। लोक अदालत में आए लोगों को खिचड़ी-कड़ी वितरित की गई।

समझौता करने के बाद नासिर और उसकी प|ी को पौधा दिया गया।

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