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आदिवासियों के त्योहार शुरू, होली तक चलेंगे

भास्कर संवाददाता | सिलावद/पलसूद आदिवासी किसान खेतों में फसलों की बोवनी के बाद पारंपरिक दित्वारिया त्योहार...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jul 10, 2018, 04:35 AM IST

आदिवासियों के त्योहार शुरू, होली तक चलेंगे
भास्कर संवाददाता | सिलावद/पलसूद

आदिवासी किसान खेतों में फसलों की बोवनी के बाद पारंपरिक दित्वारिया त्योहार मनाते हैं। मुख्य रूप से आदिवासी समाज में त्योहार की शुरुआत दित्वारिया से होकर होली तक चलती है। दित्वारिया त्योहार परंपरा अनुसार रविवार को ही मनाया जाता है। इस दिन सभी परिवार अपने घरों के बाहर भोजन बनाते हैं। गांव के सभी परिवार पटेल के घर एकत्रित होकर पटेल, पुजारा, वारती, गांव मुखिया, चौकीदार व सभी समाजजन प्रकृति की पूजापाठ करते हैं। इसके लिए आवश्यक सामग्री खैर की लकड़ी की खिल्ली, उड़द, ज्वार, प्याज, निंबू, सिंदूर, लाल मिर्ची, तलवार, ऊल्की, शराब, सिक्के, नीम की पत्ती, आम की पत्ती, बास का डंठल पूजा सामग्रियों से पारंपरिक विधि विधान से गांव पुजारा पूजा कर के गांव की सुख-शांति के लिए मन्नत मांगते हैं।

साथ ही घर को बुरी नजर से बचाने के लिए नीम, आम की पत्ती, लाल मिर्च, प्याज से बनी तोरण को मुख्य दरवाजे पर लगाते हैं। घर परिवार की सुख- शांति के लिए खैर की लकड़ी की खिल्ली बनाकर घर के मुख्य दरवाजे पर जमीन में गाड़ देते हैं। ज्वार, उड़द के दानों को कपड़े में लपेटकर कमर के कंदौरे या गले की चैन में परिवार के सदस्यों को बांधते हैं। ताकि परिवार के सदस्यों का बीमारियों से बचाव हो सके।

घर के बाहर भोजन बनाकर मनाया दित्वारिया त्योहार, ईष्ट देवताओं का पूजन किया

पूजन के लिए खैर की लकड़ी तैयार करते आदिवासी समाजजन।

पूजन सामग्री में पत्तियां का उपयोग करते हैं

ठान गांव के कसरसिंह सोलंकी ने बताया खेतों में बास की टहनी और मटकी आदि लगाते हैं। ताकि फसल का अच्छा उत्पादन हो। इसे उज्जवल करना कहते हैं। आदिवासियों का मानना है कि ऐसा करने से फसल निरोगी रहती है। कोई बुरी नजर फसल को नहीं लगती है। पूजापाठ के बाद घर के बाहर बनाया खाना सब परिवार मिलकर खाते हैं। इस प्रकार आदिवासी समाज में पारंपरिक त्योहार मनाए जाते हैं। इसलिए आदिवासी समाज सभी समाजों में अपनी अलग पहचान रखता है। सोलंकी ने बताया गांव सहित आसपास के सभी गांवों में आदिवासी समाजजनों के माध्यम से दित्वारिया त्योहार मनाया गया। समाजजन प्रकृति की पूजापाठ करते हैं। पूजन सामग्री में भी पेड़ों की पत्तियां व अनाज का उपयोग करते हैं।

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