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भीमबैठिका में होली जलाकर अन्य गांवों को दिया जाता था संकेत
आधुनिक संचार माध्यमों की कमी में ऐसे ही दिया जाता था होलिका दहन का संदेश
होली का त्यौहार मान्यताओं और परंपराओं का समागम है। देशभर में इस दिन को पूरे जोश और खुशियों के साथ मनाते हैं।कई जगहों पर फूलों की होली होती है तो कहीं लट्ठ बरसाए जाते हैं।ऐसी ही एक अनूठी परंपरा विश्व प्रसिद्ध भीमबैठिका से भी जुड़ी हुई हैं। जहां क्षेत्र में सबसे पहले भीमबैठिका में होलिका दहन किया जाता था। यहां से संकेत मिलने के बाद ही अन्य गांवों में होली जलाने की परंपरा निभाई जाती थी।इसके पीछे जानकारों का मानना है कि आधुनिक संचार माध्यमों की कमी के कारण इस तरह से संकेत दिया जाता था।हालाकिं अब आधुनिक संचार क्रांति युग ने इस प्रचीन परंपरा को समाप्त कर दिया हैं।
औबेदुल्लागंज से करीब 9 किलोमीटर दूर है भीमबैठिका। विंध्य पर्वत शृंखलाओं के उत्तरी उपान्त में स्थित छोटी-छोटी पहाडिय़ों का एक समूह है।जो यहां पहाडिय़ों और बड़ी-बड़ी चट्टानों के समूहों के बीच एक प्राचीन देवी स्थान है।जिसे माता वैष्णो देवी धाम के नाम से जाना जाता है।यहीं पर होली जलाई जाती थी।भियांपुर निवासी 65 वर्षीय लक्ष्मीनारायण यादव बताते है कि यहां होली की आग दिखाई देने के बाद ही औबेदुल्लागंज और आसपास के इलाकों में होली जलाई जाती थी,लेकिन पिछले 20वर्षों से यह प्रचीन परंपरा समाप्त हो गई हैं।क्षेत्र के नानाखेड़ी के माखन सिंह परमार ने बताया कि भीमबैठिका में होलिका पर्व के दौरान रात में होली जलने का किस्सा पूर्वजों से सुनते आ रहे हैं।वहां होलिका दहन होने के बाद ही हम लोग होली जलाते थे।वे बताते है कि उस समय संचार माध्यम नहीं होते थे इसलिए भीमबैठिका में राजा भोज के शासनकाल के पूर्व दूरदराज के लोगों को होली जलाने का संकेत देने के लिए सबसे पहले यहां होली जलना शुरू की गई होगी। तब यहां आसपास के इलाकों में बस्तियां बसाना शुरू हो गई थी।वहीं मंदिर के महंत सीताराम दास जो 1969 से साधना कर रहे है वे बताते है कि यहां होली जलते उन्होंने कभी नही देखी लेकिन लोगो का कहना है कि कोई इस पहाड़ पर सालों से होली जला रहा है। होली पर हर साल यह दृश्य दिखाई देता है। वे बताते है कि यह एक रहस्य है, जिसे कोई नहीं जान पाया है।