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खुद अकेले रहकर किया संघर्ष, पांच बच्चों के साथ अपने माता-पिता को भी संभाला कौशल्या देवी सोनी ने

रूपेश सिंह |नरसिंहगढ़ कोई सहारा नहीं और सिर पर 5 बच्चों की जवाबदारी। ईश्वर पर विश्वास और खुद के आत्मविश्वास के...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 13, 2018, 03:00 AM IST

रूपेश सिंह |नरसिंहगढ़

कोई सहारा नहीं और सिर पर 5 बच्चों की जवाबदारी। ईश्वर पर विश्वास और खुद के आत्मविश्वास के दम पर रिटायर्ड शिक्षिका कौशल्या देवी सोनी ने अपने पूरे जीवन का सफर तय किया। आज उनके सभी बच्चे अपने अपने मुकाम पर हैं। सबसे बड़ी बात अपने बच्चों के साथ अपने बुजुर्ग माता-पिता की जवाबदारी भी उन्होंने बखूबी निभाई। क्योंकि अपने माता-पिता की वे इकलौती संतान थीं। उनकी सच्ची लगन का ही परिणाम है कि जीवन भर जो पति हमेशा उनसे दूर दूर रहे, वे भी उम्र की वानप्रस्थ बेला में अब उनके पास लौट आए हैं।

कौशल्या देवी के संघर्ष की कहानी खुद उन्हीं के बेटे शिक्षक अजय सोनी की जुबानी, जो अपनी मां के साथ रहते हैं -

मेरी मां का जन्म नरसिंहगढ़ के ही बड़ा बाजार में ग्यारसी राम जी सोनी के यहां हुआ, जो एक बेहद निर्धन स्वर्णकार कारीगर थे। मां के पहले नानीजी को पांच बेटे हुए थे और सभी का देहांत हो गया। मां उनकी इकलौती संतान थीं। बेहद गरीबी के बीच ही उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। नानाजी ने उनकी शादी राजगढ़ कर दी जो 1 साल भी नहीं चल पाई। मां को लौट कर मायके आना पड़ा। बाद में स्थानीय वरिष्ठ जनों लक्ष्मीचंद बिहानी जी, प्रेम बिहानी जी और सिद्धू मल जी के प्रयासों से मां को शिक्षिका की नौकरी मिली। शुरू के सालों में उन्होंने गांव में पढ़ाया। बाद में उनका तबादला नरसिंहगढ़ में हो गया। इस बीच नानाजी ने मां की दूसरी शादी हमारे पिताजी से की जो पहले से विवाहित हैं लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। बाद में हम पांच भाई बहनों का जन्म हुआ। यह दिन बेहद गरीबी के थे। मां अकेली थी और उन पर थी हम सभी भाई बहनों के साथ-साथ नानाजी-नानीजी की जवाबदारी। पिताजी साल में एक दो बार ही मिलने आते थे। कोई आर्थिक मदद भी नहीं मिलती थी। ऐसे ही दिनों में मां ने मेरी तीनों बड़ी बहनों और बड़े भाई को किराए के मकान में रह कर सरकारी स्कूल में पढ़ाया। हालात ठीक नहीं थे, इसलिए बहनों की पढ़ाई पूरी होते-होते सभी के हाथ पीले कर दिए। 10 सालों से किराए के मकान में रहने के बाद शिक्षक कॉलोनी में किस्तों में मकान मिला जो हमारा अपना है।

अब तक हालात कुछ ठीक हुए थे तो मुझे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया गया। हम अच्छा पढ़ सकें इसलिए मां 3 किलोमीटर दूर पैदल पढ़ाने जाती थीं और बाजार से किराना,सब्जी जैसी सभी चीजें खुद पैदल ही लाती थीं। आज सभी बहनें अपने ससुराल में सुखी हैं और बड़े भाई इंदौर में अपने परिवार के साथ। मैं अपनी प|ी बच्चों के साथ मां के साथ रहता हूं। हमारी बड़ी मां का देहांत हो गया है। इसके बाद पिता जी भी हमारे साथ ही आ गए हैं। आखिर में यही कहूंगा कि वह पुराना गीत बिल्कुल सही है- ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी।

(जैसा कौशल्या देवी सोनी के बेटे अजय सोनी ने दैनिक भास्कर को बताया।)

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