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दो साल पहले आई ब्लड कंपोनेंट यूनिट शुरू नहीं हो पाई, अब बना रहे एमसीएच में एसएनसीयू शिफ्ट नहीं होने का बहाना

दो साल पहले जिला अस्पताल आई ब्लड कंपोनेंट यूनिट अब तक शुरू नहीं हो पाई है। हर बार एक बहाना सिविल सर्जन के पास तैयार...

Danik Bhaskar

Mar 02, 2018, 05:05 AM IST
दो साल पहले जिला अस्पताल आई ब्लड कंपोनेंट यूनिट अब तक शुरू नहीं हो पाई है। हर बार एक बहाना सिविल सर्जन के पास तैयार रहता है। इस बार नए एमसीएच भवन में एसएनसीयू शिफ्ट नहीं होने का बहाना बनाया जा रहा है जबकि एसएनसीयू भी शिफ्ट उन्हें ही करवाना है।

दो साल पहले 35 लाख कीमत की ब्लड कंपोनेंट यूनिट जिला अस्पताल में शासन ने भेजी। इसे शुरू करने के लिए 50 वर्ग मीटर की जगह जिला अस्पताल में चाहिए थी। लेकिन जिला अस्पताल प्रबंधन ने पहले जगह नहीं होने की बात कही। फिर न्यू मेटरनिटी वार्ड ध्वस्त हो गया और सर्जिकल वार्ड कंडम घोषित करने को बहाना बनाया। फिर ब्लड बैंक के आखिरी में स्थित मलेरिया विभाग के कमरे में इसे शुरू करने की बात कही लेकिन वहां पूछताछ केंद्र खोल दिया गया। इसके बाद ब्लड बैंक के पास स्थित आईसीडीसी (एकीकृत परामर्श जांच केंद्र) के एक कमरे में इसकी व्यवस्था के प्रयास हुए और वहां निर्माण कार्य भी शुरू किया लेकिन इसे बीच में यह कहकर रोक दिया कि यहां पहले ही जगह कम है तो इसके यहां शुरू करने से फिर दिक्कत होगी। 14 करोड़ 69 लाख की लागत एमसीएच भवन तैयार हुआ तो कहा गया कि जिला अस्पताल में स्थित एसएनसीयू एमसीएच में शिफ्ट कर एसएनसीयू की जगह ब्लड कंपोनेंट यूनिट शुरू की जाएगी। लेकिन एमसीएच भवन बने भी दो महीने होने आए लेकिन एसएनसीयू उसमें शिफ्ट नहीं हो पाया है और जिला अस्पताल में ब्लड कंपोेनेंट यूनिट शुरू नहीं हो पाई है। मशीनें ब्लड बैंक के पास वाले कमरे में धूल खा रही है। मरीजों को प्लाज्मा, आरबीसी, प्लेटलेट्स और फ्रेश फ्रोजन की आवश्यकता होने के बाद भी उन्होंने पूरा ब्लड (होल ब्लड) चढ़ाना पड़ रहा है।

सालभर में 9 हजार 200 लोगों को पूरा ब्लड चढ़ाना पड़ा

जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से 9 हजार 200 लोगों को ब्लड चढ़ाया गया है।

प्लाज्मा - बर्न (जलने) वाले मामले प्लाज्मा चढ़ाया जाता है। इस साल अब तक जलने वाले 2400 मरीजों को प्लाज्मा के बजाय पूरा ब्लड चढ़ाना पड़ा।

प्लेटलेट्स- डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स कम होने पर प्लेटलेट्स चढ़ाए जाते हैं। इस बार 800 मरीजों को प्लेटलेट्स चढ़ाने के बजाय पूरा ब्लड चढ़ाना पड़ा।

फ्रेश फ्रोजन- सर्जन (ऑपरेशन) के मामलों में इस साल 2 हजार लोगों को ब्लड के फ्रेश फ्रोजन तत्व की जरूरत थी। लेकिन उन्हें पूरा ब्लड ही चढ़ाना पड़ा।

ब्लड बैंक के पास स्थित कमरे में धूल खा रही ब्लड कंपोनेंट यूनिट की मशीनें।

आरबीसी- एनीमिया के मरीज खासकर गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान रक्त की कमी होने पर आरबीसी चढ़ाया जाता है। इस साल अब तक एनीमिया के चार हजार मरीजों को आरबीसी चढ़ाने के बजाय पूरा रक्त चढ़ाना पड़ा है।

यूनिट शुरू होने से ये होंगे फायदे

कंपोनेंट मशीन होने पर मरीज को रक्त का वही तत्व चढ़ा सकते हैं जो उसे जरूरत है तो उसका मरीज को असर जल्दी होता है। अभी पूरा ब्लड चढ़ाने से मरीज को देर से लाभ मिलता है। अभी एक यूनिट ब्लड एक मरीज को देना पड़ रहा है जबकि कंपोनेंट यूनिट से तत्व अलग होने से एक यूनिट ब्लड चार लोगों को चढ़ाया जा सकेगा। इससे ज्यादा लोगों को ब्लड देना पड़ता है और आए दिन ब्लड की कमी भी बनी रहती है।

एसएनसीयू शिफ्ट करने की तैयारी शुरू कर दी है, जल्द ही ब्लड बैंक शुरू करेंगे


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