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सभी को सोचना चाहिए कि हम आराधना कितनी करते हैं और विराधना कितनी

लक्कड़पीठा स्थित नवकार भवन बुधवार को चातुर्मास की विनंती से गूंज उठा। व्याख्यान के दौरान आचार्य विजयराज के...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 07:25 AM IST
लक्कड़पीठा स्थित नवकार भवन बुधवार को चातुर्मास की विनंती से गूंज उठा। व्याख्यान के दौरान आचार्य विजयराज के आज्ञानुवर्ती पं. र| शांतिमुनि आगामी चातुर्मास रतलाम में करने की पुरजोर विनंती की गई।

मुनिश्री ने व्याख्यान में कहा प्रभु महावीर ने ज्ञान, दर्शन और चारित्र की आराधना करने का संदेश दिया है। इसके अलावा उन्होंने कोई आराधना नहीं बताई, इसलिए सबको सोचना चाहिए कि हम आराधना कितनी करते है और विराधना कितनी होती है। मनुष्य को पापों में जितना रस आता है, उतना धर्म में नहीं आता। केवल सम्यक दृष्टि वाली आत्मा को ही आराधना में रस आता है। वह कभी पाप नहीं करती। हमें सोचना चाहिए कि हमारी दृष्टि सम्यक है अथवा मिथ्या है। पाप में भी अंतर होता है, कोई इसे करता है और किसी से होता है। सम्यक दृष्टि वाली आत्मा हर परिस्थिति में पाप से बचने का प्रयास करती है। जीवन चलाने के लिए भले ही पाप हो, लेकिन उसका लक्ष्य कभी पाप करने का नहीं होता।

प्रत्येक मनुष्य को सोचना चाहिए कि उसके अंदर कैसा भाव रहता है। ज्ञान, दर्शन और चारित्र के प्रति हमारा समर्पण कितना है। बहुमूल्य जीवन को आराधना में बिताएंगे अथवा विराधना में बिताना है। इसका निर्णय सबको करना चाहिए। सेवाभावी धैर्य मुनि ने कहा सुख मन का विषय होना चाहिए, तन का नहीं। भगवान ने जो वितराग वाणी सुनाई है, उसे केवल सुनने से काम नहीं चलेगा। उसे जीवन में उतारकर आचरण में भी लाएंगे, तो आत्मा का कल्याण होगा। संसार में प्रभु की वाणी ही ऐसी होती है, जो यथार्थ को समझती है। व्याख्यान में श्री अनुपममुनिजी म.सा.एवं कई श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे। श्री अखिल भारतीय साधुमार्गी शांत क्रान्ति जैन श्रावक संघ के साथ गुरूभक्तों ने मुनिमंडल से रतलाम में चातुर्मास की विनती की।