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बॉक्स ऑफिस पर अश्वेत भेद समाप्त

Ratlam News - ‘ब्लैक पेंथर’ नामक अमेरिकी फिल्म प्रति सप्ताह एक हजार करोड़ अर्जित कर रही है। विशेषज्ञों का कथन है कि अमेरिका में...

Dainik Bhaskar

Mar 02, 2018, 05:45 AM IST
बॉक्स ऑफिस पर अश्वेत भेद समाप्त
‘ब्लैक पेंथर’ नामक अमेरिकी फिल्म प्रति सप्ताह एक हजार करोड़ अर्जित कर रही है। विशेषज्ञों का कथन है कि अमेरिका में विभिन्न देशों के लोग बसे हैं और बॉक्स ऑफिस की मांग पर ही अश्वेत नायक को लेकर यह फिल्म गढ़ी गई है। अमेरिका में सिडनी पॉटिए की तरह अश्वेत कलाकार हुए हैं परंतु ‘ब्लैक पेंथर’ जैसी सफलता किसी भी फिल्म को नहीं मिली। सिनेमाघरों में अश्वेत दर्शक संख्या बढ़ गई है। कॉमिक्स के सुपरमैन, बैटमैन, स्पाइडर मैन इत्यादि फिल्मों के नायक श्वेत हैं। कभी अश्वेत सुपरमैन वाली फिल्म नहीं बनी है। अश्वेत कलाकारों को लेकर सामाजिक फिल्में बनी हैं। भारत में भी लंबे समय तक गोरे चिट्‌टे कलाकारों को लेकर फिल्में बनी हैं। हमारे यहां तो लंबे समय तक पात्रों का सरनेम भी नहीं दिया जाता था। हमारे यहां यह मामला इतना अधिक फॉर्मूलाबद्ध हो गया कि भारतीय क्रिश्चियन पात्र प्राय: तस्कर की भूमिकाओं में प्रस्तुत किए जाते थे। ‘जूली’ फिल्म में क्रिश्चियन पात्र संवेदनशील व्यक्तियों की तरह प्रस्तुत हुए। फिल्म में ओमप्रकाश अभिनीत पात्र भारतीय क्रिश्चियन है। वह रेल के इंजन का ड्राइवर है।

इस फिल्म की प्रेमकथा में अलग-अलग जातियों के पात्र हैं। इस फिल्म में ‘माय हार्ट इज बीटिंग’ नामक अंग्रेजी भाषा में गाया हुआ गीत भी था।

टोपाज की फिल्म ‘फिडलर ऑन द रूफ’ में क्रिश्चियन बहुल बस्ती में एक घर में यहूदी परिवार रहता है, जिसकी सुंदर कन्या से सभी मन ही मन प्रेम करते हैं परंतु उसके यहूदी होने के कारण कोई विवाह का साहस नहीं दिखाता। इस फिल्म से प्रेरित अबरार अली की पटकथा पर भी फिल्म नहीं बन सकी, क्योंकि सही ढंग से ‘फिडलर’ बनाने के लिए यह प्रस्तुत करना पड़ता कि ब्राह्मण बहुल बस्ती में सुंदर हरिजन कन्या है। हमने किसी दौर में ‘अछूत कन्या’ जैसी फिल्म बनाई है परंतु संभवत: स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद हम कुछ असहिष्णु हो गए हैं। आज हम ‘अछूत कन्या’ जैसी फिल्म नहीं बना पाएंगे। भारत में अनेक धर्म के मानने वाले लोग रहते हैं, समाज संरचना में जातिवाद समाया हुआ है। अंतरजातीय विवाह के दुस्साहस पर प्रेमियों का कत्ल कर दिया जाता है, जिसे ‘ऑनर किलिंग’ कहा जाता है यानी जातिगत सम्मान की खातिर प्रेमियों की हत्या। इसी विषय से प्रेरित मराठी भाषा की फिल्म ‘सैराट’ का हिंदी संस्करण करण जौहर बना रहे हैं, जिसमें श्रीदेवी की सुपुत्री जाह्नवी अभिनय कर रही हैं। श्रीदेवी के निधन का बॉक्स ऑफिस लाभ इस फिल्म को मिलेगा। मीना कुमारी की मृत्यु के बाद ‘पाकीजा’ खूब सफल हुई थी। मृत्यु का बॉक्स ऑफिस पर प्रभाव होता है, क्योंकि अवाम अत्यंत भावुक है और वह इस तरह भी आदरांजलि देता है। यह अजीब संयोग है कि श्रीदेवी की मां की शल्यक्रिया में की गई त्रुटि के कारण अस्पताल ने बड़ी रकम श्रीदेवी को दी थी। जैसे उनकी मां ने अपनी मृत्यु तक से बेटी की मदद की उसी तरह श्रीदेवी की मृत्यु से उनकी सुपुत्री को भी कुछ सहायता मिलेगी।

मिथुन पहले सांवले सितारे हुए हैं। उन्हें उनकी पहली फिल्म ‘मृगया’ में ही खूब सराहा गया था, जिसमें उन्होंने जनजाति के युवा की भूमिका अभिनीत की थी। चिकने-चुपड़े चेहरों की भीड़ में खुरदरे चेहरे वाले ओम पुरी भी बहुत सफल हुए थे, जिसका अर्थ है कि प्रतिभा किसी भी रूपरंग में प्रयास करती है, तो अपना मूल्य साबित कर ही देती है। एक फिल्म की शूटिंग में ललिता पवार को दृश्य की मांग पर सहकलाकार ने थप्पड़ मारा जो इतना करारा सिद्ध हुआ कि उनकी एक आंख छोटी हो गई। इस छोटी आंख के द्वारा क्रूरता प्रदर्शित करती हुई ललिता पवार को निर्मम सास की भूमिकाएं मिलती रहीं गोयाकि शारीरिक त्रुटि ही उनकी रोजी-रोटी बन गई। प्रतिभा दबाव की कितनी ही परतों के नीचे दबी हो,उसका विस्फोट होता ही है।

एक भीषण गृहयुद्ध लड़ने के बावजूद अमेरिकी समाज में अश्वेतों के प्रति अलगाव का भाव बना हुआ है। कुछ दोषपूर्ण कुटैव राष्ट्र की कुंडली में बैठ जाते हैं। जाति की संकीर्णता भारतीय समाज में बैठा ऐसा ही दोष है। अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए कस्बाई लोग महानगरों में रहते हैं, जहां निम्न जाति की महिला उनका भोजन बनाती है। सुविधाएं एवं आवश्यकताएं सारी परम्पराओं को तोड़ देती हैं। इस तरह पाक कला भी दृष्टिकोण बदलती है। इस तरह भी उदर में उठी ज्वाला भी संकीर्णता पर विजय प्राप्त करती है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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