बसंत पंचमी आज / यहां कांच के बक्से में विराजित हैं मां वाग्देवी, जितना सुना उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत मूर्ति

लंदन में मां वाग्देवी की मूर्ति। लंदन में मां वाग्देवी की मूर्ति।
ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट । ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट ।
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लंदन में मां वाग्देवी की मूर्ति।लंदन में मां वाग्देवी की मूर्ति।
ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट ।ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट ।

  • धार के दीप पटेल की दैनिक भास्कर के लिए लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से रिपोर्टिंग
  • सोचा करता था कि एक दिन जरूर लंदन जाऊंगा और मां वाग्देवी के दर्शन करूंगा

दैनिक भास्कर

Jan 30, 2020, 03:04 AM IST

धार. जबसे होश संंभाला भोजशाला का नाम और इतिहास सुनते आ रहा हूं। मां वाग्देवी की प्रतिमा तो नहीं देखी थी, लेकिन उनके फोटो और इंटरनेट पर दर्शन करता रहा। बसंत पंचमी आते ही उसी भोजशाला को लेकर कभी दंगे, तो कभी विवाद देखते आ रहा।

भोजशाला भी कई बार गया, लेकिन प्रतिमा नहीं देखी सोचा करता था कि एक दिन जरूर लंदन जाऊंगा और मां वाग्देवी के दर्शन करूंगा। वक्त बीतता गया और वो मौका आ ही गया, जब परिवार सहित मुझे मां वाग्देवी के दर्शन का सौभाग्य मिला।

 
मैं अपने काम के सिलसिले में 15 दिन के लिए लंदन गया था। साथ में पिता विजय पटेल और माताजी भी थीं। हम मौसी के घर वेलिंगटन में रुके। रिश्तेदारों से रास्ता समझा और पिता के साथ निकल पड़ा। ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में है। करीब दो घंटे में हम वहां पहुंचे। सुरक्षा जांच प्रक्रिया से गुजरकर रिसेप्शन पर पहुंचे।

यहां संग्रहालय का नक्शा दिया गया, जिसमें दुनियाभर से लाई गई वस्तुएं-प्रतिमाएं, ऐतिहासिक महत्व की चीजें देश के हिसाब से रखी दिखाई गई थीं। हमने भारत का सेक्शन चुना। भारत और चाइना के आमने-सामने सेक्शन हैं। उसमें भव्य हॉल में भारत से ले गई गई वस्तुएं-प्रतिमाएं रखी थीं। 500 से अधिक प्रतिमाओं के बीच मां वाग्देवी की प्रतिमा भी थी।

देखते ही पूरा परिवार भाव-विभोर हो गया। हमने नमन किया। फिर फोटो और वीडियो कॉल की परमिशन के बारे में पता किया। हमने धार के रिश्तेदारों, दोस्तों को वीडियो कॉल से दर्शन करवाए। मां वाग्देवी की प्रतिमा के पास ही  मां दुर्गा, गणेशजी की प्रतिमा के साथ भगवान महावीर, बुद्ध की प्रतिमाएं भी रखी थीं। -जैसा कि मिलन पाल को बताया

शास्त्रार्थ की परंपरा फिर से शुरू करना चाहिए
मद् भोज नरेशचंद्र नगरी विद्याधरी शांभरी...अर्थात राजा भोज की नगरी की विद्या की देवी। करीब सवा सौ साल पहले अंग्रेजों द्वारा धार की भोजशाला के बाहर रखी इस सफेद पत्थर की चार हाथ वाली सुंदर प्रतिमा के नीचे लिखे 1034 ईस्वी के शिलालेख पर यह पंक्तियां अंकित हैं। वाग्देवी की इस प्रतिमा का नाम बदलकर अंबिका कर दिया है। शिलालेख पर तीन लाइनें और लिखी हैं, लेकिन उसके अक्षर टूट गए हैं। राजा भोज देश-विदेश से विद्वानों को बुलाकर शास्त्रार्थ करवाते थे। यह परंपरा फिर से चालू होना चाहिए। उनके समय में सरस्वती कंठावरण भवन था, उसे शारदा सदन भी कहते थे। इसमें यह सब होता था। उसमें नाटक भी होते थे। - भगवतीलाल राजपुरोहित, साहित्यकार, उज्जैन से विशेष

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