26 अप्रैल 19 काे आईएन

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Dec 04, 2019, 10:11 AM IST
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आज भी बिंदी, चूड़ी और सिंदूर लगाकर रहती हैं करुणा, बोलीं- मेरे पति ने 1400 महिलाओं के सुहाग को जिंदा रखा, मैं उनकी प|ी थी, हूं और हमेशा ही रहूंगी


26 अप्रैल 19 काे आईएनएस विक्रमादित्य में लगी आग बुझाने के दौरान लेफ्टिनेंट कमांडर धर्मेंद्रसिंह चौहान शहीद हो गए थे। घटना से 47 दिन पहले ही 10 मार्च को इनकी शादी हुई थी। शहीद चाैहान की प|ी करुणा आज भी सिंदूर, बिंदी व चूड़ी पहनकर रहती हैं। करुणा का मानना है- मेरे पति ने 1400 महिलाओं के सुहाग को जिंदा रखा। मैं उनकी प|ी थी और हमेशा रहूंगी। पढ़ें… सिर्फ भास्कर में शहीद की प|ी और मां की कहानी, उन्हीं की जुबानी...

नेवी का अंत तक बहुत सपोर्ट रहा, मैं सौभाग्यशाली हूूूं...

उस दिन परीक्षा में ड्यूटी दे रही थी। धर्मेंद्रजी और हम 30 दिन बाद साथ रहने वाले थे, बहुत उत्साहित थी, तभी नेवी से फोन आया कि आपके पति का एक्सीडेंट हुआ है, वो आईसीयू में हैं, आप आ जाइए। मैंने रास्ते से ही रतलाम में मां को फोन लगा दिया। वहां पहुंची तब तक उन्हें बचाया नहीं जा सका था। नेवी का अंत तक बहुत सपोर्ट रहा। मैं सौभाग्यशाली हूूूं… मेरे पति ने 1400 महिलाओं का सुहाग बचाया। मैं आज भी सिंदूर-बिंदी लगाती हूं। मैंने उनके लिए करवा चौथ का व्रत भी रखा। वे हमेशा मेरे साथ हैं। हमारा साथ बहुत छोटा रहा लेकिन फेरे लेते वक्त जीवन के साथ व उसके बाद का भी सोचा था। जब तक हम दोनों खत्म नहीं होते, ये रिश्ता कैसे खत्म हो सकता है। मेरा हक है कि मैं पति के नाम का सिंदूर लगाऊं। मुझे सामाजिक प्रणाली से फर्क नहीं पड़ता।

‘मैं

प|ी करुणा सिंह।

शादी की एलबम के रुपए तो दे दिए... लेकिन घर नहीं लाए

शहीद की मां टमा कुंवर घर में अकेली ही रहती हैं। कभी वे सिसकती हैं, तो कभी बेटे को याद करती हैं। मां टमा कुंवर ने बताया ‘मेरा बेटा शेर है। बस बहुत जल्दी चला गया (रोते हुए)। ऐसे बेटे को जन्म देकर धन्य हूं। जो बच्चे 50 की उम्र में नहीं कर पाते वह 25 की उम्र में कर गया। रात में आज भी नींद नहीं आती है। दिनभर बेटे के साथ बिताए लम्हे याद आते हैं। शादी के बाद एल्बम बन गई लेकिन हम उसे घर नहीं लाए हैं। अब लाकर भी क्या करें…(रोने लगी)।’

मां के साथ शहीद धर्मेंद्रसिंह।

परिवार बोला - शहीद की प्रतिमा नहीं स्मारक बने

रिद्धि सिद्धि कॉलोनी में शहीद धर्मेंद्रसिंह चौहान की प्रतिमा लगाने की तैयारी की जा रही है। इधर, शहीद की मां व प|ी का कहना है कि वे शहीद की प्रतिमा नहीं लगवाना चाहते। ऐसा इसलिए क्योंकि भविष्य में उसकी देखरेख हो या नहीं। हम चाहते हैं कि प्रतिमा की जगह एक स्मारक बने, इस स्मारक पर शहीदी की दास्तां लिखी हो। रतलाम मेडिकल कॉलेज का नाम शहीद धर्मेंद्रसिंह चौहान के नाम पर रखा जाए।

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