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कपड़ा बाजार में मार्च अंत में ही ग्राहकी निकलने की आशा, धन की तंगी अधिक

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2019, 04:51 AM IST

Ratlam News - बसंत पंचमी के बाद कपड़ा बाजार में ग्राहकी कमजोर पड़ गई है, अथवा सन्नाटे जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। व्यापारियों...

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बसंत पंचमी के बाद कपड़ा बाजार में ग्राहकी कमजोर पड़ गई है, अथवा सन्नाटे जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। व्यापारियों का मानना है कि अब रंग पंचमी के बाद ही ग्राहकी निकलना शुरू होगी। रेडीमेड वाले दिसावर में सेंपल लेकर गए थे, जो आर्डर मिले हैं, उनकी तैयारी के लिए बाजार में थोड़ी-बहुत खरीदी चल रही है। आगामी दिनों आदिवासी इलाकों में भगोरिया के अवसर पर कपड़ों में सीमित मात्रा में ग्राहकी निकल सकती है। खेरची व्यापारी उधारी धीमी गति से वापस कर रहे हैं। इस वजह से भी धन का संकट महसूस हो रहा है, मुंबई के यार्न बाजार में हल्की-सी चहल-पहल देखी जाने लगी है। डेनिम कपड़े का अधिक उत्पादन होने से गरज के साथ बेचना पड़ रहा है।

मजबूरी का व्यापार

बसंत पंचमी के बाद कपड़ा बाजार में ग्राहकी कमजोर पड़ गई है। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की ग्राहकी अब रंग पंचमी बाद ही शुरू होने की आशा रखी जाती है। होली पूर्व जहां भी भगोरिया के समारोह होते हैं, उन आदिवासी इलाकों में थोड़ी-बहुत ग्राहकी निकल सकती है। बसंत पंचमी ग्रामीण एवं शहरों की ग्राहकी बहुत अधिक नहीं तो एकदम कम भी नहीं रही। पिछले दिनों रेडीमेड निर्माता सेंपल लेकर दिसावर की मंडियों में गए थे। जितनी भी बुकिंग करके लाए हैं, उनकी तैयारी के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कपड़ों की खरीदी कर रहे हैं। रेडीमेड निर्माताओं को अप्रैल में माल तैयार करना है। इनसे भी रुपया धीमी गति से आ रहा है। इसे दूसरे अर्थों में कहे तो पूर्व के वर्षों में कपड़े का व्यापार प्रतिष्ठा की निगाहों से देखा जाता था, वर्तमान में यह व्यापार मजबूरी का हो गया है। व्यापार करना है, वह भी छोटे खेरची व्यापारियों की शर्त पर वे जब चाहेंगे उधारी वापस करेंगे।

उचित मार्केटिंग का अभाव

इंदौर एवं मध्यप्रदेश के कपड़ा बाजार के बारे में ऊपर लिखा गया है कि पिछले दिनों भिवंडी में बायर्स-सेलर्स मीट हुई थी। उसमें भी कुछ रोचक जानकारियां सामने आई हैं। चर्चा में यह स्पष्ट हुआ है कि बाजार में टिके रहने के लिए उत्पादन क्षेत्र में परिवर्तन किए जाने चाहिए। उत्पादकों के पास उचित मार्केटिंग का अभाव है। इस समस्या से बदले जमाने में बाहर निकलना होगा। इसके लिए जरूरी है मेन पावर, मनी पावर, मशीन पावर और मार्केटिंग पावर। इन चारों का उपयोग करने पर ही सफलता मिलेगी। धन अधिक महत्वपूर्ण है। आज के समय में कुछ व्यापारियों का नैतिक पतन हो रहा है। यदि व्यापारी व्यवसाय में बने रहना चाहते हैं तो नैतिकता पर जोर देना होगा। ऐसा करने से उधारी वापस करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। व्यापारियों की पूंजी अधिक लगाना पड़ रही है किंतु रिटर्न कम मिल रहा है। आए दिन चर्चा यही होती है कि माल कम बिक रहा है और स्टॉक बढ़ रहा है। उल्लेखनीय यह भी है कि आज जो समस्या उत्पादकों की है, वैसी ही ग्राहकों की भी है। ग्राहकों की भी अपेक्षाएं अधिक हैं। ऑन लाइन वाले इस दिशा का पूरी तरह से अवलोकन कर आगे बढ़े हैं। वे सफल भी हो रहे हैं। मूल मंत्र यह होना चाहिए कि उचित मूल्य पर गुणात्मक माल देना। यह जवाबदारी उत्पादक एवं मार्केटिंग करने वालों की है। नई पीढ़ी इससे दूर जा रही है। जिस नई पीढ़ी ने टेक्नोलॉजी को अपनाया है, उन्हें सफलता मिल रही है।

मंदी का चक्र समाप्ति की ओर

बताया जाता है कि पावर लूम में मंदी का चक्र डेढ़-दो वर्ष का आता है। अब वह पूर्ण होने जा रहा है। अब तेजी का समय आ गया है। सामान्यत: डेढ़-दो वर्ष बाद तेजी का चक्र आता ही है। जानकारों का मत है कि उपरोक्त धारणा सामान्य परिस्थितियों में लागू होती थी और होती आई है, किंतु नोटबंदी, जीएसटी जैसी दो प्रणाली लागू होने के बाद डेढ़-दो वर्ष बाद जो बदलाव आने की सोच रहे हैं, वह कहां तक सफल होगी, यह कहना कठिन है। पिछले दिनों निर्यात में अच्छी मात्रा में सेंपल जाने के बाद भी आर्डर नहीं आ रहे हैं। निर्यातक भी धन की कमी से जूझ रहे हैं, जो माल निर्यात किया है, उसका भुगतान टुकड़ों, टुकड़ों में आ रहा है। इससे भी धन की तंगी बढ़ी है।

वित्त मंत्रालय रिफंड दें

जीएसटी में जिन सुधारों की त्वरित जरूरत है। उस पर न तो प्रधानमंत्री बोल रहे हैं और न वित्त अथवा कपड़ा मंत्री। सिंथेटिक कपड़ों की बिक्री पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का रिफंड काफी समय से अटका पड़ा हुआ है। इस वजह से कपड़ा उद्योग को कार्यशील पूंजी की कमी से जूझना पड़ रहा है। कच्चे माल की तुलना में सिंथेटिक कपड़ों का आयात अपेक्षाकृत सस्ता है। इस वजह से घरेलू कपड़ा उद्योग को गहरी मार पड़ रही है। कपड़ा उद्योग कठिन दौर से गुजर रहा है। घरेलू उत्पादन की तुलना में सिंथेटिक कपड़ों पर आयात शुल्क अपेक्षाकृत कम है। जिसके तहत सिंथेटिक फायबर पर कर की दर 18 प्रतिशत है, जबकि यार्न पर 12 प्रतिशत और तैयार उत्पाद पर 5 प्रतिशत। सिंथेटिक कपड़ों का आयात 15 से 20 प्रतिशत सस्ता पड़ रहा है। इसी वजह से सिंथेटिक कपड़ा उद्योग संकट में है।

पीसी-पीवी यार्न में सुधार

प्राप्त जानकारी के अनुसार मुंबई का यार्न बाजार मंडी की गिरफ्त से बाहर आता हुआ नजर आ रहा है। हालांकि भावों में बड़ी तेजी नहीं आई है, किंतु जिस तरह से बाजारों में निरसता पसरी हुई थी एवं बाजार एक तरह से ठहर-सा गया था, उसमें हल्की-सी हलचल दिखाई देने लगी है। कॉटन यार्न एवं रूई की नरमी की वजह से मांग कमजोर बनी हुई है। बाजार की ऐसी स्थिति बन गई है कि न तो मांग का दबाव है। और न किसी क्वालिटी बाजार में कमी। आपूर्ति और मांग को देखते हुए भाव न तो घट रहे हैं और न बढ़ रहे हैं। रोटो स्थिर है। सिंथेटिक यार्न की अन्य किस्मों में भी इस तरह का ट्रेड बना हुआ है। लेकिन पीसी और पीवी यार्न में कुछ सुधार जरूर हुआ है। बाजार में इस तरह के यार्न की मांग निकलना शुरू हो गई है।

सीमित कारोबार की प्रवृत्ति का उदय

उधारी वापस नहीं आने से थोक व्यापारी अंदर ही अंदर परेशानी महसूस कर रहे हैं। इस बात को पता नहीं खेरची व्यापारी क्यों न समझ पा रहे हैं। उधारी आज नहीं तो कल देना होगी। फिर एक बार उधारी डूबाने का मतलब है, अपनी स्वयं की दुकान पर आगे-पीछे ताले लगवाने की स्थिति पैदा करना है। व्यापार ईमानदारी से आपस में सम्मानपूर्वक लेनदेन से ही चलता है। 50-60 वर्षों में यह पहला अवसर है, जबकि कपड़ा बाजार में कुछ पार्टियां कमजोर पड़ी है। पिछले वर्षों में अन्य बाजारों में ब्याज दरें चाहे जो रहती आई हो किंतु कपड़ा बाजार के व्यापारियों को 80-85 पैसे के हिसाब से रुपया उधार मिल जाता था। आज भी अच्छी पार्टियों को उपरोक्त दरों पर रुपया मिल जाता है किंतु अनेक प्रतिष्ठित पार्टियों ने रुपया उधार लेना ही बंद कर दिया। कारोबार में इतना अधिक मार्जिन नहीं रह गया है कि ब्याज के मीटर की भी आपूर्ति कर सके। वर्तमान में सीमित व्यापार करने की प्रवृत्ति जोर पकड़ती जा रही है।

कपड़ा उत्पादन के बाद बेहतर मार्केटिंग जरूरी

इनपुट टैक्स क्रेडिट का रिफंड लंबे समय से पेंडिंग

पहली बार मतु कपड़ा बाजार में पार्टियां कमजोर पड़ी

भगोरिया के समय आदिवासी क्षेत्रों में हलकी-सी मांग रहेगी

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