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जीने की कला सीखें, जीवन बांस नहीं संगीत पैदा करने वाली बांसुरी बन जाएगा - राष्ट्रसंत
जीवन प्रभु का प्रसाद है। जिन्हें जीने की कला आती है उनका जीवन बांस नहीं संगीत पैदा करने वाली बांसुरी बन जाता है। हम रोकर जीते है या हंसकर, यह हमारे ऊपर निर्भर है। जो रोकर जीते है वो हर दिन मरने की सोचते है। हंसकर जीने वाले हर पल को प्रभु का प्रसाद मानकर आनंद भाव से जीते है। प्रभु को धन्यवाद दें कि उसने आपको दुर्लभ मनुष्य जीवन दिया। ऐसा करने पर थोड़ा भी हमें बहुत लगेगा। शिकायत के भाव से भरे रहेंगे तो सब कुछ भी थोड़ा ही लगेगा।
यह बात राष्ट्रसंत ललितप्रभजी ने शुक्रवार को जैन मंदिर उपाश्रय पर कही। उन्होंने कहा प्यार से जीने वाले को मरने के बाद भी याद किया जाता है। जो लड़-लड़कर जीते है वो जीते जी भी खटकते है और मरने के बाद बहुत जल्दी भूला दिए जाते है। हमें गुस्सा करने, नाराजगी दिखाने, गाली देने या नफरत करने का हक है लेकिन उसकी लिमिट अवश्य बनाएं। उसे सैकंड या अधिकतम मिनटों में खत्म करने की कोशिश करें। अगर ज्यादा देर तक नफरत और नाराजगी में जिएंगे तो इंसान के तल से गिरकर पशु के तल पर पहुंच जाएंगे। स्वर्ग और नर्क हमारी हथेली में है। हम अतीत को देखेंगे तो नर्क की आग में
झुलसेंगे। गुस्सा आने पर चिल्लाने में जितनी ताकत लगती है उससे 10 गुना ताकत चुप रहने में लगानी पड़ती है। जैसे गर्म सूर्य को कोई नहीं देखता, वैसे ही गर्म इंसान को कोई पसंद नहीं करता है। डॉ.शांतिप्रियसागर ने कहा प्रेम सबसे कीजिए, पर गुस्सा किसी पर मत कीजिए। क्रोध आपके व्यक्तित्व को धूमिल करता है। क्रोध की बजाय शांति को तवज्जो दें। घिसता है वह भगवान के चरणों में चढ़ता है, जो लकड़ी अकड़ी हुई रहती है वह केवल जलाने के काम आती है।
धर्मसभा से पहले राष्ट्र संतश्री का नगर प्रवेश हुआ। गुरुजनों ने महामांगलिक देकर जावरा की ओर विहार किया। संतश्री रविवार को जावरा पहुंचेंगे। शनिवार को रात 8 बजे पीपली बाजार में सत्संग प्रवचन होंगे।
जैन मंदिर उपाश्रय पर धर्मसभा को संबोधित करते राष्ट्रसंत ललितप्रभजी।