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सिंधिया के इस्तीफे ने प्रदेश के साथ बदले क्षेत्रीय समीकरण कालूखेड़ा आज कांग्रेस से इस्तीफा दे भाजपा में शामिल होंगे
कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में शामिल होकर न केवल प्रदेश बल्कि स्थानीय राजनीति के समीकरण भी बदल दिए। उनके नजदीकी कांग्रेस नेता एवं विस चुनाव में पार्टी प्रत्याशी रहे के.के. सिंह कालूखेड़ा ने 100 नेता-कार्यकर्ताओं के साथ 12 मार्च को भोपाल जाकर पार्टी से इस्तीफा देने व सिंधिया के नेतृत्व में भाजपा से जुड़ने का ऐलान कर दिया। इससे सारे समीकरण बदल गए। कालूखेड़ा के कई समर्थक खुलकर जहां सिंधिया वहां हम के नारे दे रहे तथा कुछ कांग्रेस का मैदान खाली देखकर मंथन में जुटे है कि पार्टी छोड़ें या नहीं। इधर भाजपा ने सिंधिया के पार्टी में शामिल होते ही घंटाघर चौराहे पर आतिशबाजी की।
सियासी उथल-पुथल के बीच भाजपा ने अपने सभी विधायकों मंगलवार रात भोपाल से बस में बैठाकर सुरक्षित स्थान भेज दिया। उनका मोबाइल बंद है, इसलिए जावरा के समीकरण को लेकर विधायक डॉ. राजेंद्र पांडेय की प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई। वहीं केके सिंह कालूखेड़ा का कहना है गुरुवार को 100 पदाधिकारी-कार्यकर्ता के साथ भोपाल जाकर सभी पदों से इस्तीफा देंगे व सिंधिया के नेतृत्व में भाजपा ज्वाइन करेंगे। भाजपा की स्थानीय गुटबाजी के प्रश्न पर कालूखेड़ा ने कहा हम सिंधिया के नेतृत्व में पार्टी लाइन का काम करेंगे। विचारधारा से जुड़ेंगे इसलिए गुटबाजी का प्रश्न नहीं है। कांग्रेस में मैदान खाली होने के सवाल पर उन्होंने कहा कांग्रेस की अब कांग्रेस जानें। यदि वे महाराज की कद्र करते तो ये नौबत ही नहीं आती। सिंधिया ने चुनाव में 135 सभाएं की। सरकार बनवाई और उन्हें ही अलग-थलग कर दिया। उनकी उपेक्षा हुई। प्रदेश अध्यक्ष तक नहीं बनाया तो कब तक वे शोषण के शिकार होते। कमलनाथ सरकार में खुद क्या परेशानी झेली, इसे लेकर कालूखेड़ा ने कहा मैं किसानों की लड़ाई लड़ा लेकिन अच्छे परिणाम नहीं मिले। स्वास्थ सुविधाएं सुधारना चाहता था लेकिन इसमें भी रिजल्ट नहीं मिले, ऐसी कई बातें है।
स्टेट पॉलिटिक्स का लोकल साइड इफेक्ट ः जानिए क्षेत्रीय राजनीति से लेकर जनता तक इसका क्या असर है..
भाजपा मजबूत होगी, खेमेबाजी बढ़ेगी या नई लाइन खींचेगी- ज्यादा कुछ बदलेगा तो वह है क्षेत्रीय राजनीति। जावरा विधानसभा ही नहीं बल्कि मंदसौर लोकसभा क्षेत्र भाजपा बाहुल्य है। यहां पूर्व मंत्री रहे महेंद्रसिंह कालूखेड़ा ने सिंधिया समर्थकों की फौज खड़ी की। इससे कांग्रेस भाजपा के टक्कर में आई और ज्यादातर विधानसभा चुनावों में दोनों के प्रत्याशियों में कांटे की टक्कर रही। महेंद्रसिंह के जाने के बाद ये बागडोर उनके भाई के.के. सिंह संभाल रहे हैं। ऐसा दावा किया जा रहा है कि यदि केके सिंह भाजपा में शामिल होते है तो उनके साथ काम करने वाले हजारों सक्रिय कार्यकर्ता भी दल बदलेंगे है। ऐसा हुआ तो वोटों के मान से भाजपा मजबूत होगी लेकिन गुटबाजी यहां भी है। इसलिए कालूखेड़ा अपने से 511 वोट ज्यादा लाकर विधायक बने डॉ. राजेंद्र पांडेय के साथ खड़े रहेंगे। पार्टी विचारधारा में आगे बढ़ेंगे। भाजपा की गुटबाजी में किसी एक पलड़े को भारी करेंगे अथवा सिंधिया लाइन से भाजपा में ही नई लकीर खींचेंगे, यह समय बताएगा। इस बीच भाजपा नेता रितेश जैन तो होली पर कालूखेड़ा पहुंचकर सिंह के साथ होली मना आए।
मंथन में जुटेः- सिंह के साथ कांग्रेस आईटी सेल प्रदेश महासचिव अनिल टांक ने भी कांग्रेस छोड़ने की बात कही है। जबकि बाकी नेता मैदान खाली देखकर असमंजस में है। कालूखेड़ा समर्थक धरमचंद चपड़ोद, शहर अध्यक्ष पवन चौरसिया, पूर्व नेता प्रतिपक्ष इब्राहिम मंसूरी ने कहा पदाधिकारी बैठकर मंथन करेंगे, फिर बताएंगे पार्टी छोड़े या नहीं।
कांग्रेस का मैदान खाली, बाहरी नेता एंट्री करेंगेः कालूखेड़ा के कांग्रेस छोड़ने के बाद बाकी कांग्रेस नेताओं के लिए मैदान खाली हो जाएगा। पूर्व गृहमंत्री कुंवर भारतसिंह, डॉ. हमीरसिंह राठौर, यूसुफ कड़पा व इनके समर्थक पकड़ और मजबूत करने में जुटेंगे। खाली मैदान देखकर बाहरी नेता यहां एंट्री मारने की तैयारी में है। मूलतः जावरा के रहने वाले लेकिन आलोट की राजनीति में सक्रिय निजाम काजी ने तो निकाय चुनाव के मद्देनजर पहले से ही यहां सक्रियता बढ़ा दी।
राजनीति के रंग : विरोधी थे तो क्या, अब एक हो जाएं
विचारधारा से जुड़ेंगे इसलिए गुटबाजी का प्रश्न नहीं है। कांग्रेस में मैदान खाली होने के सवाल पर उन्होंने कहा कांग्रेस की अब कांग्रेस जानें। यदि वे महाराज की कद्र करते तो ये नौबत ही नहीं आती। सिंधिया ने चुनाव में 135 सभाएं की। सरकार बनवाई और उन्हें ही अलग-थलग कर दिया। उनकी उपेक्षा हुई। प्रदेश अध्यक्ष तक नहीं बनाया तो कब तक वे शोषण के शिकार होते। कमलनाथ सरकार में खुद क्या परेशानी झेली, इसे लेकर कालूखेड़ा ने कहा मैं किसानों की लड़ाई लड़ा लेकिन अच्छे परिणाम नहीं मिले। स्वास्थ सुविधाएं सुधारना चाहता था लेकिन इसमें भी रिजल्ट नहीं मिले, ऐसी कई बातें है।
घंटाघर चौराहे पर जश्न मनाने पहुंचे भाजपाई
सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा नगर मंडल अध्यक्ष पवन सोनी, पिछड़ा मोर्चा जिलाध्यक्ष नंदकिशोर महावर, युवा मोर्चा प्रदेश पदाधिकारी राहुल उपमन्यू, नगर अध्यक्ष सौरभ पगारिया, वरिष्ठ नेता महेश सोनी, अजय भाटी, इफ्तेखार पठान, राजेश शर्मा ने आतिशबाजी की। कालूखेड़ा के भाजपा ज्वाइन करने के बयान पर बोले उनका भी स्वागत है।
कालूखेड़ा भाजपा में आते है तो पार्टी मजबूत होगी लेकिन गुटबाजी यहां भी है। ऐसे में ये दो ध्रुव कितने नजदीक आएंगे यह समय बताएगा। ज्ञात रहे पांच दिन पहले ही नपा के पट्टा वितरण कार्यक्रम में इन्होंने एक-दूसरे के विरोध में बयान दिए थे। (तस्वीर नवंबर 2018 दीपावली की है।)
विकास, उद्योग-रोजगार व बड़े प्रोजेक्टः- शुगरमिल की जगह गारमेंट एंड टेक्सटाइल पार्क स्थापित होना है। सरकार बदलती है तो प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला जाएगा या यूं कहें कि फिर से फेरबदल हो सकता है। भाजपा सरकार में यहां फूड प्रोसेसिंग पार्क स्वीकृत हुआ था लेकिन कांग्रेस सरकार आते ही इसे गारमेंट एंड टेक्सटाइल पार्क में बदल दिया। अभी मूर्त रूप नहीं लिया, ऐसे में फिर बदलाव से प्रोजेक्ट पिछडऩे का डर है। रेलवे ब्रिज समेत अन्य बड़े प्रोजेक्ट को गति मिलेगी या रूकेंगे, ये सरकार स्थिर होने या नई बनने के बाद ही स्पष्ट होगा।
जनता- विचारधारा के साथ रहें या नेताः- वे लोग जो चुनाव में वोट देते है लेकिन किसी पार्टी से सीधे नहीं जुड़े, बल्कि नेता या विचारधारा से प्रभावित होकर मतदान करते हैं। ऐसे लोग असमंजस में है कि अब वह विचारधारा के साथ रहें या नेता विशेष के पीछे चले। नेता तो दल बदलकर इधर से उधर हो रहे। अब जनता का रूख निकाय चुनाव में सामने आएगा कि वे क्या सोचते हैं।
किसान- इन्हें तो कर्जमाफी की चिंताः- भाजपा-कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता जहां सियासी उठापटक की चर्चा में मशगूल है, वहीं किसान वर्ग दो लाख तक के कर्ज को लेकर चिंतित है। तीन-चार दिनों से ग्रामीण चौपालों पर एक ही चर्चा है कि यदि कमलनाथ सरकार चली गई तो हमारे कर्जमाफी का क्या होगा। भाजपा ने तो ये वादा किया नहीं था और जिसने किया वह सरकार ही पलट जाएगी तो हम ठगा महसूस करेंगे। हमारा कर्ज तो माफ ही नहीं होगा। बता दें जिले में 1 लाख 38 हजार किसान कर्जमाफी की श्रेणी में शामिल है और इसमें से अब तक 50 फीसदी का ही कर्ज माफ हुआ और बाकी इंतजार ही कर रहे हैं।