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बेटियों को गलत धंधे से दूर रख पढ़ाया अब वे समाज का नया चेहरा बन गईं

एक वर्ष पहले
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पुष्पादेवी सोलंकी। ये वो नाम है जिसने बांछड़ा समुदाय की गलत धंधे की परम्परा को तोड़ने की जिद की। आज उनकी बेटियां समाज का नया चेहरा बनकर उभरी हैं। उन्हें सफल होते देख समाज की अन्य युवतियां भी शिक्षा पाकर आगे बढ़ रही हैं।

पुष्पादेवी जब मां बनने वाली थीं तभी तय कर लिया कि बेटी हुई तो उसे गलत धंधे के दलदल में नहीं जाने देगी। पति विक्रम सोलंकी इस निर्णय में साथ रहे। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मजदूरी की। सिलाई की। आज उनकी बड़ी बेटी सोनालिका सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं तो दूसरी बेटी संजना एयर होस्टेस। उनका एक बेटा नीतेश भी है जो पुलिस सेवा में है।

मंदसौर-नीमच-रतलाम जिले में बांछड़ा समुदाय बाहुल्य 73 गांवों में समाजजनों की संख्या करीब 20 हजार है। उन सभी के लिए पुष्पा का परिवार आज प्रेरणा स्रोत बन चुका है। समाज के अन्य परिवार इनसे प्रेरणा लेकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। नर्सिंग, पंचायत, शिक्षा विभाग समेत प्रशासनिक दफ्तरों में अब तक 21 युवतियां रोजगार पा चुकी हैं।

मां की जिद ने हमें बचा लिया : संजना

19 वर्षीय संजना कहती हैं कई बार मां ने भूखे रहकर हमें खाना खिलाया। उस दौर में ज्यादा गरीबी के बाद भी खेती कर मेहनत की। सिलाई कर हमारे स्कूल की फीस भरी। भाई को सरकारी स्कूल में भेजा और हमें निजी स्कूल भिजवाया। उनकी बदौलत एयर होस्टेस तक का सफर तय किया है।


समाज के बच्चों के लिए स्कूल खोलूंगी : सोनालिका


ई गवर्नेंस में सॉफ्टवेयर इंजीनियर 25 वर्षीय सोनालिका कहती हैं बेंगलुरू में 8 लाख रुपए सालाना पैकेज मिल रहा। 2 साल यहीं सर्विस करूंगी। बचत कर रही हूं। निजी खर्च से समाज के बच्चों के लिए गांव में स्कूल खोलना चाहती हूं। गांव से जो सीखा उसे गांव में ही दूंगी। मैं जब भी गांव में जाती हूं तो छोटे बच्चों को पढ़ाई को लेकर पूरा सपोर्ट करती हूं।


बांछड़ा समाज में महिला की जिद

बेटियों को निजी स्कूल भेजा, तंगी थी तो बेटे को सरकारी स्कूल में पढ़ाया

}बड़ी बेटी सॉफ्टवेयर इंजीनियर और छोटी बनीं एयर होस्टेस

}समाज में बदलाव, 21 युवतियां अब तक पा चुकी रोजगार

सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटी सोनालिका, मां पुष्पादेवी, बेटा नीतेश (पुलिसकर्मी) और एयर होस्टेस बनी बेटी संजना।


मेरा जन्म बर्डिया में हुआ। पांच बहनें थीं। बचपन में ही गरीबी से सामना हो गया। पिताजी भागीरथ मालवीय का हाथ बंटाते थे। पांचों बहनों को बाल विवाह के दौर में उन्होंने साक्षर किया। 32 साल पहले मेरी शादी गांव में ही विक्रमजी के साथ हुई। गांव में समाज के कई घरों में परंपरागत धंधे का चलन रहा, यह देख मन दुखता था। किसी की मजबूरी थी तो कोई परंपरा के नाम से चलते गए। मैंने घर में रह सिलाई की, खेत पर काम किया। बेटे नीतेश को सरकारी स्कूल में पढ़ाया। बेटी सोनालिका और संजना को मनासा में निजी स्कूल में पढ़ाया। तीन-चार दशक पहले तक बेटियों को बोझ समझा जाता था। मुझे फक्र है कि समाज की टीना मालवीय नायब तहसीलदार सहित शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस व प्राइवेट जॉब में 25 से ज्यादा समाज की युवतियां आ चुकी हैं।
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