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सरकारें कर रही हैं इनके इनोवेशन का इस्तेमाल

टेक वर्ल्ड के लिए विश्वसनीयता बड़ा संकट बन गई है। कंपनियां इसका हल खोेजने में लगी हैं। ऐसे में भारतीय मूल के दो...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 11, 2018, 04:50 AM IST

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    टेक वर्ल्ड के लिए विश्वसनीयता बड़ा संकट बन गई है। कंपनियां इसका हल खोेजने में लगी हैं। ऐसे में भारतीय मूल के दो अमेरिकी युवाओं ने सोशल प्लेटफॉर्म पर फैल रही भ्रामक जानकारियों को पहचानने का टूल इजाद किया है। वहीं, देश के दो युवा डेटा की ताकत से सरकार और बड़ी संस्थाओं को आर्थिक फैसले लेने में मदद कर रहे हैं। तो अमेरिका की युवती निराश और तनावग्रस्त युवाओं की मदद काउंसलिंग के जरिए कर रही है। आइए मिलते हैं इन युवाओं से जिनके टेक इनोवेशन बड़ी समस्याओं को हल करने में अहम साबित हो रहे हैं...

    युवाओं के तीन अनूठे टेक इनोवेशन: सोशल प्लेटफॉर्म पर गलत सूचना के बारे में बताते हैं, डेटा को आसान बनाते हैं और जिंदगियां भी बचाते हैं

    आश भट और रोहन फडते हाईस्कूल से दोस्त हैं। दोनों करीब 20 साल के हंै। हाल में इनकी रोभट लैब्स ने बोटचेकडॉट एमई पेश किया है। यह ब्राउजर ट्विटर यूजर्स को यह पता लगाने में मदद करता है कि अकाउंट इंसान चला रहा है या रोबोट। यह इस बात की भी जानकारी देता है कि कौन से बोट नेटवर्क रियल टाइम में ट्वीट कर रहे हैं। अमेरिका की डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी को इसका पता चला तो रोभट को सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारी पर रिपोर्ट बनाने की जिम्मेदारी दी गई। बर्कले में पढ़ाई के दौरान दोनों ने प्रेसिडेंशियल एक्शंस एप बनाया था। व्हाइट हाउस के सारे आदेश इस पर आ जाते थे। तब राष्ट्रपति ट्रंप ने बर्कले की फंडिंग बंद करने की धमकी दी थी। फिलहाल दोनों ऐसा टूल बना रहे हैं, जिससे साइट पर आने वाली न्यूज, फोटो या वीडियो में किसी भी छेड़छाड़ को पकड़ा जा सके।

    बोटचेकडॉटएमई (आश भट- रोहन फडते)

    वेबसाइट पर खबर, फोटो और वीडियो में कुछ भी बदला गया तो इनका टूल बता देगा

    सिंगापुर यूनिवर्सिटी से बिजनेस स्टडी के बाद गोल्डमैन साक्स से इंटर्नशिप कर चुकीं पृकल्पा और क्लासमेट वरुण बंका ने 2013 में सोशलकॉप्स की शुरुआत की थी। यह डेटा एनालिसिस का काम करती है। 2016 में इन्हें भारत सरकार ने गांवों में रहने वाली उन महिलाओं की जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी दी जो लकड़ी या धुंआ फैलाने वाले ईधन का इस्तेमाल करती थीं। सरकार 5 करोड़ घरों में गैस सिलंेडर देना चाहती थी, इसके लिए सरकारी तेल कंपनियों के हजारों सेंटर खोले जाने की जरूरत थी। सोशलकॉप्स की टीम 17 हजार गैस डिस्ट्रीब्यूटरों से मिली। आबादी, सेंटर से दूरी, आर्थिक स्थिति आदि का डेटा जमा किया। इससे सेंटर खोलने के लिए सही स्थान की जानकारी मिल पाई। पहले ही साल में इन्होंने 2.2 करोड़ घरों का डेटा तैयार कर लिया, जबकि टारगेट 1.5 करोड़ का ही दिया गया था।

    सोशलकॉप्सडॉटकॉम (पृकल्पा शंकर-वरुण बंका)

    इनके जुटाए डेटा के आधार पर सरकार, कॉरपोरेट और नीति निर्माता लेते हैं महत्वपूर्ण फैसले

    क्राइसिस टैक्स्ट लाइन 25 साल से कम उम्र के ऐसे लोगों के लिए काम करती है जो अपनी समस्या सोशल साइट्स पर शेयर करते हैं, तनावग्रस्त हैं या खुदकुशी करना चाहते हैं। यह अमेरिकी आपातकालीन सेवा (911) से कनेक्टेड है। इसके 4,000 वॉलंटियर और काउंसलर चौबीसों घंटे सेवाएं देते हैं। वॉलंटियर्स परेशान व्यक्ति के पिछले चैट जांचते हैं। इससे पता चलता है कि वह कितने तनाव में है। 2016 में इससे प्रेरित होकर ओहियो स्टेट ने क्राइसिस टैक्स्ट लाइन- फॉर होम कैंपेन शुरू किया था। इसे स्कूली बच्चों केे बीच पहुंचाया गया, क्योंकि स्टूडेंट्स काफी तनाव में रहते थे। नैंसी ने इसकी शुरुआत टेक स्टार्टअप के रूप में की थी। लेकिन डेटा एनालिसिस ने उनके काम को और रोचक बना दिया। फिलहाल उनकी टीम ऐसे सॉफ्टवेयर पर काम कर रही है जो काउंसलर्स को तेजी से काम करने में मदद दे सके।

    क्राइसिस टैक्स्ट लाइन (नैंसी लुबलिन )

    तनावग्रस्त युवाओं से बात करके उनकी जिंदगियां बचा रही हैं, उनकी समस्याएं हल कर रही हैं

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Web Title: सरकारें कर रही हैं इनके इनोवेशन का इस्तेमाल
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