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नकारात्मक छवि, फिर भी कुछ उदाहरण हैं, जो पुलिस की मानवीय तस्वीर पेश करते हैं

तो पुलिस की प्रचलित छवि नकारात्मक ही है। ऐसा माना जाता है कि राजनीतिक गलियारों की हुक्म उदूली ही उनकी नौकरी है।...

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 02:40 AM IST
तो पुलिस की प्रचलित छवि नकारात्मक ही है। ऐसा माना जाता है कि राजनीतिक गलियारों की हुक्म उदूली ही उनकी नौकरी है। धारणा यह भी है कि वह सिर्फ नेताओं, अफसरों और धन्नासेठों की ही सुरक्षा और सेवा में जुटी रहती है। आम लोगों में उसकी दिलचस्पी कम ही है, लेकिन कुछ ऐसे वाकये भी हैं, जो पुलिस की इस परंपरागत छवि के उलट तस्वीर पेश करते हैं। ऐसा ही एक वाकया मंगलवार को हनुमानगंज थाने में देखने को मिला। दरअसल अपने दो बेटों और बहुओं के सितम से दुखी 82 साल की मीराबाई (सांची निवासी) सड़क किनारे आंसू बहाती देखी गई। पूछने पर पता चला बहू-बेटों ने बस से बिठाकर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। कोई विकल्प न होने से वे भोपाल में उतर गईं। इस उम्र में अब कहां जाए। उसका कोई आसरा नहीं है। बुजुर्ग की बातें सुनकर टीआई का दिल पसीज गया। फौरन महिला के चंदेरी में नौकरी कर रहे बेटे को फोन लगाया। उसे मां को साथ रखने की हिदायत कानूनी समझाइश के साथ दी। बाद में एक एनजीओ की मदद से बुजुर्ग को वृद्धाश्रम पहुंचाया। इसके पहले उसे जादू की झप्पी भी दी। सेल्फी ली और खाना भी खिलाया। टीआई के इस व्यवहार से बुजुर्ग की आंखें नम हुईं तो उसने उन्हें दुआ से खूब नवाजा। यह जानकर अच्छा लगा। इसी तरह का एक उदाहरण कोलार का है। वहां ट्रैफिक जाम में एक गर्भवती महिला फंस गई। उसे प्रसव पीड़ा होने लगी तो वहां के टीआई ने स्थिति को भांपते हुए फौरन उसे अपने वाहन से अस्पताल पहुंचाया। वहीं, चेतक ब्रिज पर एक वाहन दुर्घटना में लहूलुहान छात्र तड़प रहा था कि वहां से गुजरते हुए सूखीसेवनियां के एक पुलिस अफसर ने देखा तो वे उसे फौरन अस्पताल ले गए। समय पर इलाज मिलने से छात्र की जान बच गई। यकीन मानिए अगर हमारी पुलिसिंग का यह आचरण उसके व्यवहार का हिस्सा बन जाए तो सामाजिक तौर पर बहुत कुछ सुधर जाएगा। वैसे, समाज में अधिकतर पुलिसिया किस्से नकारात्मक मिलते हैं, लेकिन ये उदाहरण बेहतर पुलिसिंग की मानवीय तस्वीर पेश करते हैं। पुलिस का ये व्यवहार समाज में विश्वास को कायम करता है। यह विश्वास बनाना और उसे बढ़ाना आज की पुलिस की अहम जिम्मेदारी है। मौजूदा वक्त में हमारी पुलिस को नए तरीके से नए साधनों के असर और उनके प्रयोगों से जोड़ने की जरूरत है। डायल 100 जैसे प्रयोग भी एक मिसाल हैं। ऑनलाइन एफआईआर जैसे प्रयोग से उम्मीद की जा सकती है कि एक स्मार्ट पुलिस का चेहरा देखने को मिलेगा। बदलते युग में समाज के समक्ष पुलिस को एक नए तरीके से सामने आना होगा। उसे अपनी छवि और कार्यशैली बदलनी होगी। वैसे ये प्रसन्नता की बात है कि भोपाल में थाने से लेकर डीजीपी स्तर तक जनसुनवाई के प्रयोग भी चल रहे हैं। यानी प्रयास है कि भरोसा कायम किया जाए। विश्वास बहाली हो और छवि भी सुधरे। अनुमान लगाया जा सकता है कि इन प्रयोगों से पुलिस अधिकारी जनता के मनोभावों को भी समझ रहे हैंै।

प्रसंगवश: पुलिस सुधार की लंबी मुहिम का कोई कारगर नतीजा नहीं निकलने से क्षुब्ध होकर 1996 में पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने 1977-81 के पुलिस आयोग की उपेक्षित सुधार-सिफारिशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। वे बीएसएफ (बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स) के मुखिया भी रहे। इसके अलावा यूपी और असम पुलिस के मुखिया के रूप में उनकी सख्त मिजाज अफसर के रूप में पहचान रही है। उनकी कोशिशों से दस बरस में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला पुलिस आयोग की सिफारिशों के पालन, सियासत और नौकरशाही के हस्तक्षेप और दबावों से मुक्त रखने पर केंद्रित रहा। यह अत्यंत दुखद है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का केरल को छोड़कर किसी भी राज्य ने अब तक पालन नहीं किया। जनता के नजरिये से देखें तो पुलिस सुधार का मतलब है एक संवेदी और लोकतांत्रिक पुलिस। Áअलीम बजमी