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एतिहासिक किले के जीर्णोद्धार के लिए मिली 1 करोड़ रुपए की दूसरी किस्त, बदलने लगी इमारत की सूरत

ताल तलैयों की नगरी बल्देवगढ़ के एतिहासिक किले को फिर से नई रंगत दी जा रही है। पुरातत्व विभाग ने दो साल पहले 70 लाख रुपए...

Danik Bhaskar | Feb 02, 2018, 03:00 AM IST
ताल तलैयों की नगरी बल्देवगढ़ के एतिहासिक किले को फिर से नई रंगत दी जा रही है। पुरातत्व विभाग ने दो साल पहले 70 लाख रुपए की पहली किस्त से किले के मुख्य द्वार सहित दीवारों की रिपेयरिंग कराई थी। अब दूसरी किस्त जारी कर दी गई है। जिससे एक बार फिर मरम्मत का काम शुरू हो गया है। इस दौरान किले के जीर्णशीर्ण हिस्से को सुधारा भी जा रहा है। जीर्णोद्धार से किले की सूरत बदलने लगी है। दरअसल ओरछा रियासत के राजा विक्रमाजीत सिंह बुंदेला ने मराठाओं के आतंक से बचने के लिए टीकमगढ़ को राजधानी बनाया था। अपनी सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए टीकमगढ़ के आसपास किलों का निर्माण कराया गया था। इसी दौरान बल्देवगढ़ किले का निर्माण कराया गया। यहां सैन्य ताकत के साथ युद्ध सामग्री का भंडारण किया जाता था। किले की बुर्जों पर बड़ी-बड़ी तोप रखकर किले की दुश्मनों से सुरक्षा की जाती थी। इनमें विशालकाय भवानी शंकर व गर्भ गिरावन तोप सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रहीं। किले के तीन ओर बने तालाब और पहाड़ियां इसे सुरक्षित बनाती हैं। साइड सुपरवाईजर सुंदरलाल आर्य ने बताया कि किले की साफ-सफाई के दौरान मिट्‌टी के वर्तन, पत्थर के गोले मिले हैं। जिनका वजन ढ़ाई किलो से लेकर 10 किग्रा तक है। इनको परीक्षण के लिए भेजा जा रहा है। जिससे यह पता लगाया जा सके कि आखिर ये किस शताब्दी के हैं। उन्होंने बताया कि किले के दूसरे चरण का काम जून 2018 तक पूरा होने की उम्मीद है।

अच्छी खबर

पुरातत्व विभाग ने दो साल पहले 70 लाख रुपए की पहली किस्त से किले के मुख्य द्वार सहित दीवारों की कराई थी रिपेयरिंग

भास्कर संवाददाता। बल्देवगढ़

ताल तलैयों की नगरी बल्देवगढ़ के एतिहासिक किले को फिर से नई रंगत दी जा रही है। पुरातत्व विभाग ने दो साल पहले 70 लाख रुपए की पहली किस्त से किले के मुख्य द्वार सहित दीवारों की रिपेयरिंग कराई थी। अब दूसरी किस्त जारी कर दी गई है। जिससे एक बार फिर मरम्मत का काम शुरू हो गया है। इस दौरान किले के जीर्णशीर्ण हिस्से को सुधारा भी जा रहा है। जीर्णोद्धार से किले की सूरत बदलने लगी है। दरअसल ओरछा रियासत के राजा विक्रमाजीत सिंह बुंदेला ने मराठाओं के आतंक से बचने के लिए टीकमगढ़ को राजधानी बनाया था। अपनी सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए टीकमगढ़ के आसपास किलों का निर्माण कराया गया था। इसी दौरान बल्देवगढ़ किले का निर्माण कराया गया। यहां सैन्य ताकत के साथ युद्ध सामग्री का भंडारण किया जाता था। किले की बुर्जों पर बड़ी-बड़ी तोप रखकर किले की दुश्मनों से सुरक्षा की जाती थी। इनमें विशालकाय भवानी शंकर व गर्भ गिरावन तोप सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रहीं। किले के तीन ओर बने तालाब और पहाड़ियां इसे सुरक्षित बनाती हैं। साइड सुपरवाईजर सुंदरलाल आर्य ने बताया कि किले की साफ-सफाई के दौरान मिट्‌टी के वर्तन, पत्थर के गोले मिले हैं। जिनका वजन ढ़ाई किलो से लेकर 10 किग्रा तक है। इनको परीक्षण के लिए भेजा जा रहा है। जिससे यह पता लगाया जा सके कि आखिर ये किस शताब्दी के हैं। उन्होंने बताया कि किले के दूसरे चरण का काम जून 2018 तक पूरा होने की उम्मीद है।

पुरानी तकनीकि से कर रहे

रिपेयरिंग

रिपेयरिंग कंपनी के ठेकेदार अर्जुन पुरी ने बताया कि रिपेयरिंग के साथ टूटी-फूटी दीवारों को सुधारा भी जा रहा है। मरम्मत में गुड़, बेल, उड़द की दाल सहित अन्य चीजों का मसाला बनाकर दीवारों की रिपेयरिंग की जा रही है। जिससे दीवारों का लंबे समय तक क्षरण नहीं होगा। उन्होंने बताया कि दूसरे चरण में किले में फर्शियां बिछाई जा रही हैं। सभी प्रमुख दरवाजों को प्रमुख रूप से संवारा जा रहा है। छतों की रिपेयरिंग भी की जा रही है।