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संस्था में भोजन बनाकर व बर्तन साफ कर बेघर बुजुर्ग महिला निभा रही रोटी का फर्ज

Sagar News - वह जानती है कि जहां से उसे भरपेट भोजन मिल रहा है, उस संस्था के प्रति भी उसकी कुछ जिम्मेदारी बनती है। वहां सेवा करना...

Dainik Bhaskar

Mar 02, 2018, 05:15 AM IST
संस्था में भोजन बनाकर व बर्तन साफ कर बेघर बुजुर्ग महिला निभा रही रोटी का फर्ज
वह जानती है कि जहां से उसे भरपेट भोजन मिल रहा है, उस संस्था के प्रति भी उसकी कुछ जिम्मेदारी बनती है। वहां सेवा करना उसका फर्ज है। पहले भगवान को भोग फिर खुद भोजन करना। रसोई में रोटी बनाना, सब्जी काटना और एक भी बर्तन गंदा दिखा तो फट से साफ करना और कचरा फैलते ही झाड़ू लगाना। क्या अब भी उसे आप विक्षिप्त मानेंगे। शायद नहीं। यह कहानी है सीताराम रसोई में रह रही उस बेघर बुजुर्ग महिला की। जिसे 20 दिन पहले समिति ने तिली तिराहे पर पहली बार रात का भोजन दिया और चंद दिन में ही उसकी जीवनशैली बदल गई।

65-70 साल की महिला तिली तिराहा आगम पेट्रोल पंप पर खुले आसमान के नीचे रात गुजार रही थी। कुछ खाने को मिल गया तो ठीक वरना भूखे ही सो जाना। घर जाते वक्त एक दिन समिति सचिव इंजीनियर प्रकाश चौबे की नजर इस महिला पर पड़ी। उन्होंने तय किया कि ऐसे लोगों को कम से कम रात का भोजन तो दे ही सकते हैं। उन्होंने समिति सदस्य आलोक अग्रवाल, डॉ. राजेंद्र चऊदा, डब्बू मुखारया, राजकमल केशरवानी, मनोज डेंगरे, कृष्ण पाल ठाकुर से चर्चा की। यहीं से समिति को सीताराम रसोई-भूखा न सोए कोई अभियान की प्रेरणा मिली। 9 फरवरी को कलेक्टर आलोक सिंह ने इसी महिला को भोजन परोसकर इस पुनीत कार्य की शुरुआत की। समिति सदस्य उसे भूतेश्वर मंदिर स्थित भवन ले आए। जहां उसकी दशा ही बदल गई। रोज स्नान कर मंदिर जाती है। धीरे-धीरे अब बाेलने लगी हैं। समिति के काम में हाथ बंटाती हैं। उसके परिवार का पता नहीं। बाेलचाल से रीवा तरफ की निवासी लगती हैं। सचिव चौबे ने बताया कि प्रयास है कि उसके परिवार का पता लगाया जा सके। उन्होंने बताया कि 6 साल पहले इसी तरह एक अन्य महिला को समिति ने आसरा दिया था। वह अब जबलपुर में अपने परिवार के साथ रह रही है।

इस हाल में उन्हें सीताराम रसोई संस्था लाया गया

भास्कर संवाददाता | सागर

वह जानती है कि जहां से उसे भरपेट भोजन मिल रहा है, उस संस्था के प्रति भी उसकी कुछ जिम्मेदारी बनती है। वहां सेवा करना उसका फर्ज है। पहले भगवान को भोग फिर खुद भोजन करना। रसोई में रोटी बनाना, सब्जी काटना और एक भी बर्तन गंदा दिखा तो फट से साफ करना और कचरा फैलते ही झाड़ू लगाना। क्या अब भी उसे आप विक्षिप्त मानेंगे। शायद नहीं। यह कहानी है सीताराम रसोई में रह रही उस बेघर बुजुर्ग महिला की। जिसे 20 दिन पहले समिति ने तिली तिराहे पर पहली बार रात का भोजन दिया और चंद दिन में ही उसकी जीवनशैली बदल गई।

65-70 साल की महिला तिली तिराहा आगम पेट्रोल पंप पर खुले आसमान के नीचे रात गुजार रही थी। कुछ खाने को मिल गया तो ठीक वरना भूखे ही सो जाना। घर जाते वक्त एक दिन समिति सचिव इंजीनियर प्रकाश चौबे की नजर इस महिला पर पड़ी। उन्होंने तय किया कि ऐसे लोगों को कम से कम रात का भोजन तो दे ही सकते हैं। उन्होंने समिति सदस्य आलोक अग्रवाल, डॉ. राजेंद्र चऊदा, डब्बू मुखारया, राजकमल केशरवानी, मनोज डेंगरे, कृष्ण पाल ठाकुर से चर्चा की। यहीं से समिति को सीताराम रसोई-भूखा न सोए कोई अभियान की प्रेरणा मिली। 9 फरवरी को कलेक्टर आलोक सिंह ने इसी महिला को भोजन परोसकर इस पुनीत कार्य की शुरुआत की। समिति सदस्य उसे भूतेश्वर मंदिर स्थित भवन ले आए। जहां उसकी दशा ही बदल गई। रोज स्नान कर मंदिर जाती है। धीरे-धीरे अब बाेलने लगी हैं। समिति के काम में हाथ बंटाती हैं। उसके परिवार का पता नहीं। बाेलचाल से रीवा तरफ की निवासी लगती हैं। सचिव चौबे ने बताया कि प्रयास है कि उसके परिवार का पता लगाया जा सके। उन्होंने बताया कि 6 साल पहले इसी तरह एक अन्य महिला को समिति ने आसरा दिया था। वह अब जबलपुर में अपने परिवार के साथ रह रही है।

... अब यहां सामान्य महिला की तरह रोटी बना रहीं अम्मा

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