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बदली परिस्थितियों में रूई का निर्यात 70 लाख गठान, कपड़ा बाजार में मांग कम

बदली हुई परिस्थितियों में रूई का निर्यात 70 लाख गठान हो सकता है, जबकि पूर्व में अनुमान 50 से 55 लाख गठान का लगाया गया था।...

Dainik Bhaskar

May 10, 2018, 03:10 AM IST
बदली हुई परिस्थितियों में रूई का निर्यात 70 लाख गठान हो सकता है, जबकि पूर्व में अनुमान 50 से 55 लाख गठान का लगाया गया था। भारतीय कपास संघ ने वर्ष 2017-18 में कपास के उत्पादन अनुमान 360 को बरकरार रखा है। हालांकि राज्यों में होने वाले उत्पादन आंकड़ों में संशोधित किया है। महाराष्ट्र में 2 लाख एवं कर्नाटक में 50 हजार गठान की बढ़ोतरी की गई है। गुजरात में 105 लाख गठान का अनुमान लगाया है।

तेलंगाना में 1.5 लाख एवं आंध्र में 1 लाख गठान पूर्व अनुमान से कम होगी। तेज गर्मी की वजह से मप्र एवं राजस्थान के कपड़ा बाजार में ग्राहकी कमजोर है। मलमास लगने वाला है। व्यापारियों को थोड़ी-बहुत आशा रमजान की ग्राहकी से है। ग्रे-मालों में उठाव कम होने से उत्पादन में कमी करने की चर्चा है। भीलवाड़ा में उत्पादकों ने 4 से 5 रुपए मीटर की भाव वृद्धि की है, किंतु लेवाल अभी पीछे हट रहे हैं। क्रूड तेल में तेजी से सिंथेटिक यार्न के भावों में तेजी आना लगभग तय है। इसे कोई भी रोक नहीं सकता है। कपड़ों पर भाव वृद्धि का भार पड़ने वाला ही है। भारत से रूई का निर्यात इस वर्ष पूर्व अनुमान से 25 से 30 प्रतिशत अधिक हो सकता है। निर्यात 70 लाख गठान तक पहुंच सकता है, जबकि सीजन के प्रारंभ में 50 से 55 लाख गठान निर्यात का अनुमान था। इसी वजह से पिछले महीनों में रूई के भावों में मंदी आई थी। अभी तक 55 लाख गठान के निर्यात सौदे हो चुके हैं। 10 से 15 लाख गठान के सौदे और हो सकते हैं। पाकिस्तान की रूई में मांग अधिक है। इसके अलावा बांग्लादेश एवं वियतनाम की मांग भी बनी हुई है। चीन में भारत से रूई खरीदी कम कर रखी है। हाल ही हमें 1.50 लाख गठान रूई निर्यात का सौदा पिछले दिनों हुआ है। चीन अभी तक रिजर्व स्टॉक से घरेलू जरूरतों को पूरी कर रहा है। संभव है आने वाले महीनों में आयात सौदे और कर ले। रूई में तेजी से किसानों को कपास के अच्छे भाव उपज रहे हैं।

वायरस से नुकसान

पिंक बॉलवार्म वायरस लगने से कपास की फसल को नुकसान हुआ है। चालू सीजन में कपास के उत्पादन अनुमानों में कमी की जाने लगी है। विश्व बाजार में तेजी और रुपए की कमजोरी से रूई निर्यातकों को बढ़ावा मिल रहा है। इसके अलावा आयात कम होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। संभव है आने वाले महीनों में सरकारी अनुमान भी कम हो सकता है। इस वर्ष वायरस के नुकसान को देखते हुए अगले वर्ष कुछ मात्रा में बोवनी क्षेत्र में कमी आ सकती है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष कपास की बोवनी 122 लाख हेक्टेयर में हुई थी और प्रारंभिक अनुमान 400 लाख गठान उत्पादन का लगाया जा रहा था, किंतु महाराष्ट्र और तेलंगाना में कपास की फसल को वायरस लगने से दोनों राज्यों उत्पादन में बड़ी गिरावट आई है। पूर्व अनुमान 377 लाख गठान से घटाकर 367 लाख गठान पूर्व में ही कर दिया गया था जैसे-जैसे सीजन समाप्त हो रहा है, उत्पादन अनुमान घटकर 360 लाख गठान का लगाया जाने लगा है। इनमें भी कमी हो सकती है। 15 अप्रैल तक कपास की आवक 285 लाख गठान की हुई है, जो कि गत वर्ष के समान है।

कपड़ों में ग्राहकी कम

तेज गर्मी की वजह से मप्र, राजस्थान के कपड़ा बाजारों में ग्राहकी कम है। व्यापारी नया माल नहीं मंगवाना चाहते हैं। बाजार में धन की तंगी की वजह से घबराहट भी है। उधारी काफी देरी से आ रही है। गर्मी के बावजूद अगले सप्ताह से रमजान की ग्राहकी शुरू हो जाने की आशा रखी जानी है। रमजान में सलवार-सूट्स एवं कमीज-पायजामा के कपड़ों की बिक्री अधिक मात्रा में होती है। मप्र के अनेक व्यापारी कॉटन के सलवार-सूट्स लेने के लिए सूरत, अहमदाबाद गए हुए भी हैं। यही वजह है कि सूरत बाजार में रमजान की आगामी दिनों में निकलने वाली ग्राहकी की पूछपरख देखी जा रही है। भावों में स्थिरता बनी हुई है। वैसे देखना यह भी है कि रमजान की ग्राहकी जोरदार निकलती है अथवा सामान्य। वैसे व्यापारी अच्छी ग्राहकी की आस लगाए बैठे हैं।

रमजान की ग्राहकी निकलने की आशा

लग्नसरा का सीजन नहीं होने और आगामी दिनों में अधिक मास लग जाने से कपड़ा बाजार में ग्राहकी कमजोर चल रही है। यह संभव है कि अगले सप्ताह या कुछ दिन बाद रमजान की ग्राहकी निकल जाए। निर्यात में मांग अच्छी है। रूई एवं यार्न में तेजी की वजह से कॉटन यार्न में 20 से 25 प्रतिशत की तेजी आ गई है। घरेलू बाजार पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, क्योंकि बाजार ठंडा है। बाजार धन की तंगी से ग्रस्त है। इंदौर में भी दो व्यापारियों के लड़खड़ाने की चर्चा से बाजार अंदर ही अंदर भयभीत है। हालांकि एकंदर में बाजार की स्थिति सुदृढ़ है। व्यापार में जोखिम आती रहती है। नोटबंदी एवं जीएसटी ने व्यापारियों को परेशानी में डाला है। इसके अलावा कपड़े की खपत में भी कमी आई है। पिछले वर्षों जैसा कपड़े का भरावा नहीं है। इसका श्रेय जीएसटी को जाता है।

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