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ईरान के साथ परमाणु समझौता खारिज होते ही बंटे ट्रम्प के मंत्री

Bhaskar News Network | Last Modified - May 14, 2018, 03:15 AM IST

मार्क लैन्डलर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सहयोगी देशों से बिना विचार-विमर्श किए ईरान के साथ हुई परमाणु डील से खुद को पीछे खींच लिया। उस डील में अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी थे, जो ट्रम्प के इस फैसले से आहत हुए हैं। ऐसी स्थिति में जब ट्रम्प कुछ कहने से बच रहे हैं, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो आगे आए हैं और वे इन तीनों देशों के राजनयिकों को आश्वासन दे रहे हैं कि इस डील (समझौते) को अब भी बचाए रखने के प्रयास किए जाएंगे।

माइक पोम्पियो की क्षमता का परीक्षण अब किया जाएगा, उन्हें अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श करना है। वे मानते हैं कि दोनों पक्षों के बीच जो दरार आई है वह खाई की तरह है। उस पर सेतु बनाकर आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन उसकी संभावना कम ही है। ईरान पर जो प्रतिबंध लगे हैं, वो सात से 13 वर्ष में समाप्त हो जाएंगे। कुछ ही दिन पहले ब्रिटिश विदेश मंत्री बोरिस जॉन्सन ने वाशिंगटन यात्रा की थी, वहां उनकी सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं। माइक पोम्पियो ने उनसे साफ कह दिया कि राष्ट्रपति ट्रम्प चाहते हैं कि ओबामा प्रशासन में ईरान के साथ जो डील हुई थी, वह खारिज होनी चाहिए। केवल यही नहीं, ट्रम्प यह भी चाहते हैं कि ईरान पर पहले से अधिक प्रतिबंध लगने चाहिए। यह जानना महत्वपूर्ण है कि ट्रम्प के फैसले से खुद उनकी कैबिनेट के लोग खुश नहीं हैं। वे आपस में बंट गए हैं। उनके फैसले के कारण व्हाइट हाउस के अंदर अलग वातावरण निर्मित हो गया है। खासतौर पर माइक पोम्पियो और नए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन। यहां बोल्टन उभरते नेता दिख रहे हैं क्योंकि वे उन आवाजों को दबाना जानते हैं जो ट्रम्प को लेकर उठती हैं।

रक्षा मंत्री जिम मैटिस ईरान डील से हटने के ट्रम्प के फैसले के खिलाफ थे, लेकिन उन्होंने उसका विरोध करना उचित नहीं समझा क्योंकि उनकी बात नहीं सुनी जाती। इससे बचने के लिए न केवल उन्होंने चुप्पी साधी बल्कि वे मामले से दूर हो गए जबकि इसके पहले वे बहुत सख्त समझे जाते थे, पूर्व में सीआईए के डाइरेक्टर भी रह चुके हैं। नई भूमिका में उन्होंने खुद को परिवर्तित कर लिया है। विश्लेषक मानते हैं कि ईरान डील के फैसले में नौकराशाही के हस्तक्षेप से कहीं ज्यादा बहस ट्रम्प की अपनी टीम के भीतर हो रही है। उनके बीच कई ऐसे नेता हैं, जो प्रशासन के तौर-तरीकों में बदलाव चाहते हैं। उदाहरण के लिए मैटिस को ही लीजिए, वे विरोधी देशों की सरकारों का व्यवहार बदलना चाहते हैं जबकि बोल्टन चाहते हैं कि सरकारें खुद अपने व्यवहार में बदलाव करें। वूड्रो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स में इंटरनेशनल सिक्यूरिटी स्टडीज़ के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट रॉबर्ट एस. लिटवाक कहते हैं, 9/11 हमले के बाद से ही अमेरिका की नीतियों में यह बात शामिल है कि जहां भी ‘दुष्ट सरकारें’ हैं, वहां या तो शासन बदला जाए या वे खुद में बदलाव कर लें। अगर बदलाव नहीं होता है तो उसका विकल्प प्रतिबंध लगाना और सैन्य दबाव डालना भी है। हालांकि, कई बार यह अपर्याप्त होता है क्योंकि उन सरकारों के किसी भी हिस्से से खतरा उत्पन्न हो सकता है।

पिछले दशक से भी अधिक पहले से एवं कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोल्टन ने इस बात की वकालत की थी कि ईरान सरकार में बदलाव लाना चाहिए। उन्होंने हाल ही में वॉइस ऑफ अमेरिका के एक कार्यक्रम में कहा कि वहां के नेतृत्व में परिवर्तन करना उनके प्रशासन का उद्देश्य नहीं है। रक्षा मंत्री मैटिस ईरान को लेकर तभी से असंतुष्ट हैं जब वे मरीन कमांडर हुआ करते थे, लेकिन वे ईरान के साथ डील से पीछे हटने के भी खिलाफ थे। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका मानना है कि इससे नाटो संगठन कमजोर पड़ सकता है और उसका असर उत्तर कोरिया के साथ होने वाली बातचीत पर भी पड़ सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोल्टन नए जरूर हैं, लेकिन ट्रम्प के साथ उनकी अच्छी बनती है। उन्होंने भी स्पष्ट कहा कि ईरान के साथ वह डील त्रुटियों से पूर्ण थी, उसका कोई मतलब नहीं रह गया था। केवल उसके बल पर हम ईरान को परमाणु हथियार पाने से नहीं रोक सकते थे। बोल्टन की हाजिर जवाबी के कारण रक्षा मंत्री मैटिस खुद को व्हाइट हाउस में अलग-थलग महसूस करने लगे हैं, क्योंकि उनके अनुभवों की बात कोई सुनने वाला नहीं है।

© The New York Times

दैनिक भास्कर से विशेष अनुबंध के तहत

अमेरिकी रक्षा मंत्री मैटिस एवं कई राजनयिक नहीं चाहते थे कि ईरान समझौते से पीछे हटा जाए। वे उसकी गंभीरता से वाकिफ हैं, लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प के आगे कोई कुछ नहीं बोल सकता। परिणाम यह हुआ कि ट्रम्प के प्रमुख मंत्री ही आपस में बात करने से बच रहे हैं।

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