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विरासत का व्यापार और व्यापार की सियासत

आजकल घटित हो रही बातें और बयानबाजी ‘बिलीव इट ऑर नॉट’ में शामिल की जा सकती हैं। इन्हें ‘गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 01, 2018, 03:20 AM IST

विरासत का व्यापार और व्यापार की सियासत
आजकल घटित हो रही बातें और बयानबाजी ‘बिलीव इट ऑर नॉट’ में शामिल की जा सकती हैं। इन्हें ‘गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में भी शामिल किया जा सकता है। एक खबर है कि दिल्ली के लाल किले के रखरखाव व पर्यटकों से वसूली का अधिकार एक औद्योगिक घराने को दे दिया गया है। रखरखाव संभवत: यही कंपनी रखेगी, परन्तु पर्यटकों को महंगे दाम चुकाने होंगे। महंगाई के दौर में ऐतिहासिक स्थानों को देखना सस्ता कैसे हो सकता है। मध्यप्रदेश की सरकार भी सांची और खजुराहो के लिए इसी तरह की व्यवस्था करने जा रही है गोयाकि ऐतिहासिक विरासत को व्यापार बना दिया गया है। लोभ और लाभ से संचालित विचार प्रक्रिया इससे अधिक नहीं सोच सकती। अजंता और एलोरा की गुफाओं पर भी किसी व्यापारी का नियंत्रण कभी भी घोषित किया जा सकता है। इस तरह सोचने वाले किसी दिन उपनिषद और वेदों को भी व्यापार जगत को सौंप सकते हैं। इस तरह ग्रन्थों के ठेके दिए जाने पर जर्मनी ऊंची बोली लगा सकता है क्योंकि वह इनका अनुवाद करने वाला पहला देश रहा है।

कई दर्शक पूर्व नेहरू युग में फिल्मकार चेतन आनंद ने ऐतिहासिक इमारतों पर एक कार्यक्रम रचा था जिसमें सर्च लाइट जिस हिस्से पर पड़ता है, उस हिस्से का इतिहास और उसकी बनावट की बारीकियों का विवरण कॉमेन्ट्री द्वारा किया जाता था। यह ‘साइट एन्ड साउंड’ और ‘लाइट एन्ड शेडो’ की जुगलबंदी की तरह था। यश चोपड़ा की फिल्म ‘लम्हे’ का क्लाइमैक्स इसी तरह के स्थान पर रचा गया था। ‘लम्हे’ के नायक का कोई खून का रिश्ता नायिका से नहीं था परन्तु उसकी पुण्यतिथि पर हर वर्ष वह लंदन से भारत आकर हवन करता था और एक बार हवन कुंड से उठती हुई लपट के मध्य वह नायिका की बेटी को पहली बार देखता है। इसी दृश्य के कारण उनकी प्रेम कहानी कमजोर हो जाती है। सनातन रीति रिवाजों को मानने वाले दर्शक के लिए हवन की लपट के मध्य देखी गई कन्या से उपजी प्रेम कथा को पचाना कठिन होता है।

बहरहाल अब लाल किले की देखरेख व्यापारी के हाथ है तो भय लगता है कि कहीं वह लाल रंग पर गेरुआ या भगवा रंग न चढ़ा दे क्योंकि उत्तर प्रदेश में ऐसा किया गया था परन्तु अवाम के विरोध के बाद जस का तस कर दिया गया। बारह मई सोलह सौ उनचालीस के दिन किले का निर्माण प्रारंभ हुआ और उस्ताह एहमद इसके आर्किटेक्ट थे जैसे ईसा आफन्दी ताजमहल के आर्किटेक्ट थे। गौरतलब यह है कि पर्सिया से आए इन वास्तुविदों ने भारत में जिस तरह की इमारतें गढ़ीं, वे उन इमारतों से एकदम अलग हैं जो उन्होंने पर्सिया में बनाई थीं। इन उस्तादों का विश्वास था कि इमारत जमीन से वैसे ही उभरना चाहिए जैसे पौधे जमीन से अंकुरित होते हैं। आधुनिक बहुमंजिला इमारतें तो खंजर की तरह धरती के सीने में ठोक दी गई लगती हैं। छ: अप्रैल सोलह सौ अड़तालीस को काम पूरा हुआ।

लाल किला 254 एकड़ में फैला है और अंडाकार आकार लिए हुए है। बहादुर शाह जफर इसमें निवास करने वाले आखिरी बादशाह थे। मोहम्मद शाह ‘रंगीला’ इसमें बीस वर्ष तक रहा। उसके संगीत प्रेम और नृत्य के प्रति झुकाव के कारण उसे रंगीला कहा गया।

हर वर्ष पंद्रह अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री लाल किले पर राष्ट्रध्वज फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। लाल किले के रखरखाव को ठेके पर दिए जाने के विषय में एक नेता ने कहा कि इस तरह तो संसद भवन की देखरेख भी व्यापारी को दी जा सकती है। दरअसल अनेक सांसदों को चुनाव लड़ने के लिए धन औद्योगिक घरानों से मिलता है, अत: उनके हितों की रक्षा भी करना पड़ती है। इस तरह देखें तो लाल किला पहली इमारत नहीं जिसकी देखरेख व्यापारी के सुपुर्द की गई है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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