• Hindi News
  • Madhya Pradesh
  • Sagar
  • शांति की तलाश में हम अशांति के साधन जुटा रहे : अादित्यमति माता
--Advertisement--

शांति की तलाश में हम अशांति के साधन जुटा रहे : अादित्यमति माता

Sagar News - सागर | विपरीत परिस्थितियों में भी समता का भाव रखना धर्मात्मा की पहचान है। दूसरों की विपत्ति को अपनी संपत्ति समझना...

Dainik Bhaskar

May 10, 2018, 04:00 AM IST
शांति की तलाश में हम अशांति के साधन जुटा रहे : अादित्यमति माता
सागर | विपरीत परिस्थितियों में भी समता का भाव रखना धर्मात्मा की पहचान है। दूसरों की विपत्ति को अपनी संपत्ति समझना ही सज्जनता की पहचान है। यह विचार आर्यिका आदित्यमति माताजी ने तिलकगंज जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि एक महाव्रती संत शरीर की आयु की चिंता नहीं करता। बल्कि आत्मा के कल्याण की बात करता है। शरीर रोगों से और संसार भोगों से भरा पड़ा है। जब हम संसार के भोगों को देखते हैं या भोगते हैं तो शरीर के ये रोग सक्रिय हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि ये महल आदि सब अचेतन हैं। जिनका नष्ट होना तय है। हम सब शांति की तलाश में भटक रहे हैं और अशांति के साधन जुटा रहे हैं।

ऐसे अनेक लोग हैं, जो ये कहते हैं कि हमारे बिना पत्ता नहीं हिलेगा। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हारे जाने के बाद फूल खिले। ये सब अहंकार की भाषा ही है। अहंकार ही क्रोध का कारण बनता है और क्रोध ही संसार में भटकाने वाला है। यदि यह कहे कि जीवन में पुण्य से नहीं प्रभु कृपा से सब मिला है तो कभी अहंकार नहीं होगा। धर्मसभा के पहले आर्यिका संघ को रमेश बंडा व सुरेश जैन ने शास्त्र भेंट किया।

सागर | विपरीत परिस्थितियों में भी समता का भाव रखना धर्मात्मा की पहचान है। दूसरों की विपत्ति को अपनी संपत्ति समझना ही सज्जनता की पहचान है। यह विचार आर्यिका आदित्यमति माताजी ने तिलकगंज जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि एक महाव्रती संत शरीर की आयु की चिंता नहीं करता। बल्कि आत्मा के कल्याण की बात करता है। शरीर रोगों से और संसार भोगों से भरा पड़ा है। जब हम संसार के भोगों को देखते हैं या भोगते हैं तो शरीर के ये रोग सक्रिय हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि ये महल आदि सब अचेतन हैं। जिनका नष्ट होना तय है। हम सब शांति की तलाश में भटक रहे हैं और अशांति के साधन जुटा रहे हैं।

ऐसे अनेक लोग हैं, जो ये कहते हैं कि हमारे बिना पत्ता नहीं हिलेगा। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हारे जाने के बाद फूल खिले। ये सब अहंकार की भाषा ही है। अहंकार ही क्रोध का कारण बनता है और क्रोध ही संसार में भटकाने वाला है। यदि यह कहे कि जीवन में पुण्य से नहीं प्रभु कृपा से सब मिला है तो कभी अहंकार नहीं होगा। धर्मसभा के पहले आर्यिका संघ को रमेश बंडा व सुरेश जैन ने शास्त्र भेंट किया।

X
शांति की तलाश में हम अशांति के साधन जुटा रहे : अादित्यमति माता
Astrology

Recommended

Click to listen..