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प्रदेश के 14 हजार 557 तो सागर के 248 स्कूलों में जरूरत के मुताबिक टॉयलेट नहीं

प्रदेश के स्कूलों में वर्ष 2015 से स्वच्छ विद्यालय अभियान चल रहा है। इसके आधार पर स्कूलों की ग्रेडिंग तक तय हो रही है,...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 10, 2018, 04:05 AM IST

प्रदेश के स्कूलों में वर्ष 2015 से स्वच्छ विद्यालय अभियान चल रहा है। इसके आधार पर स्कूलों की ग्रेडिंग तक तय हो रही है, जबकि हकीकत यह है कि मध्यप्रदेश के 14 हजार 557 प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। 16 हजार 849 स्कूलों में टॉयलेट बने तो हैं, लेकिन उपयोग लायक नहीं हैं। यह आंकड़ा सागर जिले में 248 पर है। 27 सरकारी स्कूलों में शौचालय ही नहीं हैं। 221 स्कूलों में हैं, लेकिन पानी नहीं होने के कारण इनका उपयोग नहीं हो रहा है।

यह खुलासा डाइस डाटा वर्ष 2017-18 के आधार पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग को भेजे गए पत्र से हुआ है। पत्र के अनुसार 5 हजार 126 स्कूल ऐसे हैं, जहां पीने तक को पानी नहीं है। इसलिए यहां भी टॉयलेट का उपयोग न के बराबर हो रहा होगा। प्रदेश के 36 हजार 532 स्कूलों में पानी और टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। प्रदेश में कुल 1 लाख 13 हजार 833 प्राइमरी और मिडिल स्कूल हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो 32.09 प्रतिशत यानी एक तिहाई स्कूल बदहाल स्थिति में हैं।

परीक्षण कर डाइस डाटा में सुधार के दिए निर्देश

स्कूलों में टॉयलेट नहीं होने एवं जहां टॉयलेट हैं, वहां उपयोग नहीं होने के आंकड़ों में एचआरडी द्वारा पत्र जारी होने के बाद स्कूल शिक्षा विभाग अब अपने डाइस डाटा में सुधार करवाने जा रहा है। दरअसल विभाग को लगता है कि डाटा फीडिंग में गलती की गई है। आरएमएसए की अपर मिशन संचालक अनुभा श्रीवास्तव ने जो पत्र जारी किया है, उसमें लिखा है कि डाइस डाटा वर्ष 2016-17 में स्कूलों में टॉयलेट गेप की संख्या 9 हजार 594 बताई गई है, जबकि वर्ष 2017-18 के डाइस डाटा में यही संख्या 14 हजार 557 प्रदर्शित हो रही है। इनमें 8 हजार 317 बालक और 6 हजार 240 बालिका शालाएं बताई गई हैं। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि डाइस डाटा 2017-18 में शौचालय गेप की जो स्थिति बताई गई है, उसका परीक्षण कर डाटा में सुधार किया जाए। डाइस डाटा में शिथिलता बरतने वाले डीपीसी, प्रोग्रामर एवं सहायक यंत्री पर कार्यवाही करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

परीक्षण कर डाइस डाटा में सुधार के दिए निर्देश

स्कूलों में टॉयलेट नहीं होने एवं जहां टॉयलेट हैं, वहां उपयोग नहीं होने के आंकड़ों में एचआरडी द्वारा पत्र जारी होने के बाद स्कूल शिक्षा विभाग अब अपने डाइस डाटा में सुधार करवाने जा रहा है। दरअसल विभाग को लगता है कि डाटा फीडिंग में गलती की गई है। आरएमएसए की अपर मिशन संचालक अनुभा श्रीवास्तव ने जो पत्र जारी किया है, उसमें लिखा है कि डाइस डाटा वर्ष 2016-17 में स्कूलों में टॉयलेट गेप की संख्या 9 हजार 594 बताई गई है, जबकि वर्ष 2017-18 के डाइस डाटा में यही संख्या 14 हजार 557 प्रदर्शित हो रही है। इनमें 8 हजार 317 बालक और 6 हजार 240 बालिका शालाएं बताई गई हैं। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि डाइस डाटा 2017-18 में शौचालय गेप की जो स्थिति बताई गई है, उसका परीक्षण कर डाटा में सुधार किया जाए। डाइस डाटा में शिथिलता बरतने वाले डीपीसी, प्रोग्रामर एवं सहायक यंत्री पर कार्यवाही करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

बुंदेलखंड : टीकमगढ़ की स्थिति ठीक तो दमोह सबसे खराब

बुंदेलखंड यानी सागर संभाग की कुल 12 हजार 702 प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में से 3 हजार 338 में टॉयलेट और पानी की समस्या है। सागर की 3140 स्कूलों में से 27 में जरूरत के मुताबिक टॉयलेट नहीं हैं तो 221 में पानी के इंतजाम नहीं हैं। 221 में टॉयलेट का यूज नहीं हो रहा है। छतरपुर में 2788 में से 416, दमोह में 2059 में से सर्वाधिक 1453, पन्ना में 2342 में से 875 स्कूलों के खस्ताहाल हैं। टीकमगढ़ के कुल 2373 स्कूलों में से मात्र 85 स्कूलों में ही टॉयलेट और पानी की समस्या है।

मरम्मत और पानी की व्यवस्था के लिए कलेक्टर को दी जिम्मेदारी

राज्य शिक्षा केंद्र की अपर मिशन संचालक अनुभा श्रीवास्तव ने प्रदेश भर के कलेक्टर के नाम पत्र जारी कर कहा है कि स्कूलों में स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के लिए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग एवं नगरीय क्षेत्र की स्कूलों के लिए नगरीय निकाय से समन्वय कर पानी की उपलब्धता कराई जाए। साथ ही यह भी कहा है कि शौचालय यदि मरम्मत के योग्य है तो उनकी मरम्मत के प्रस्ताव बनाते हुए उन्हें वार्षिक कार्ययोजना 2018-19 में शामिल करें।

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