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"पत्नी का साथ मकान की चौखट तक और अच्छे कर्म भगवान तक ले जाते हैं'

पशुपतिनाथ मंदिर में बीते एक सप्ताह से चल रही भागवत कथा ज्ञानयज्ञ का सोमवार को भक्तिमयी रूप से समापन किया गया।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 04:35 AM IST

पशुपतिनाथ मंदिर में बीते एक सप्ताह से चल रही भागवत कथा ज्ञानयज्ञ का सोमवार को भक्तिमयी रूप से समापन किया गया। व्यासपीठ से पंडित अभिनंदन महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए बताया कि मनुष्य रिश्तों की डोर में बंधकर मोह, माया, काम वासना से हट नहीं ं पा रहा है। जबकि यह सभी चीजें एक सीमित दायरे तक ही इंसान का साथ निभाती है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य के वर्तमान का कर्म मृत्यु के बाद का समय को सुनिश्चित करता है। मनुष्य का जीवन काम, क्रोध, लोभ की विसंगती से दूर नही हो पा रहा है। जबकि मृत्यु के बाद यही सत्य है कि प|ी का साथ मकान की चौखट तक, समाज का साथ श्मशान भूमि तक, पुत्र का साथ चिता को अग्नि देने तक और उसके कर्म का साथ भगवान तक पहुंचाने का काम करते है।

अंतिम दिन की भागवत कथा में अनेक रसमयी गीतों के साथ द्वारिका दर्शन, सुदामा चरित्र एवं कृष्ण उद्धव संवाद को के बारे में बताया गया। पंडितजी ने कहा कृष्ण के बाल्यकाल मे सुदामा उनका परम व घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे। लेकिन बाद मे कंश के वध के बाद जब कृष्ण को द्वारका का राजपाठ मिल गया, तो उनसे सुदामा व अन्य दोस्त बिछड़ गए। इस समय श्रीकृष्ण द्वारिका के महाराजाधिराज हुआ करते थे। सुदामा अपनी प|ी के साथ अत्यंत ही गरीब परिवेश में जीवन यापन कर रहे थे। लेकिन सुदामा कभी भी कृष्ण के पास जाकर मदद मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। गरीबी में जीवन यापन करने के बाद एक दिन सुदामा की प|ी ने आस-पड़ोस के घर से एक मुठ्ठी चावल मांगकर सुदामा को देते हुए द्वारिका कृष्ण के पास जाने की विनती की। तब सुदामा द्वारिका में आकर कृष्ण से मिले तो कृष्ण ने नंगे पांव महल से दौड़कर सुदामा को अपने गले लगा लिया था।

भास्कर संवाददाता | सागर

पशुपतिनाथ मंदिर में बीते एक सप्ताह से चल रही भागवत कथा ज्ञानयज्ञ का सोमवार को भक्तिमयी रूप से समापन किया गया। व्यासपीठ से पंडित अभिनंदन महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए बताया कि मनुष्य रिश्तों की डोर में बंधकर मोह, माया, काम वासना से हट नहीं ं पा रहा है। जबकि यह सभी चीजें एक सीमित दायरे तक ही इंसान का साथ निभाती है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य के वर्तमान का कर्म मृत्यु के बाद का समय को सुनिश्चित करता है। मनुष्य का जीवन काम, क्रोध, लोभ की विसंगती से दूर नही हो पा रहा है। जबकि मृत्यु के बाद यही सत्य है कि प|ी का साथ मकान की चौखट तक, समाज का साथ श्मशान भूमि तक, पुत्र का साथ चिता को अग्नि देने तक और उसके कर्म का साथ भगवान तक पहुंचाने का काम करते है।

अंतिम दिन की भागवत कथा में अनेक रसमयी गीतों के साथ द्वारिका दर्शन, सुदामा चरित्र एवं कृष्ण उद्धव संवाद को के बारे में बताया गया। पंडितजी ने कहा कृष्ण के बाल्यकाल मे सुदामा उनका परम व घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे। लेकिन बाद मे कंश के वध के बाद जब कृष्ण को द्वारका का राजपाठ मिल गया, तो उनसे सुदामा व अन्य दोस्त बिछड़ गए। इस समय श्रीकृष्ण द्वारिका के महाराजाधिराज हुआ करते थे। सुदामा अपनी प|ी के साथ अत्यंत ही गरीब परिवेश में जीवन यापन कर रहे थे। लेकिन सुदामा कभी भी कृष्ण के पास जाकर मदद मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। गरीबी में जीवन यापन करने के बाद एक दिन सुदामा की प|ी ने आस-पड़ोस के घर से एक मुठ्ठी चावल मांगकर सुदामा को देते हुए द्वारिका कृष्ण के पास जाने की विनती की। तब सुदामा द्वारिका में आकर कृष्ण से मिले तो कृष्ण ने नंगे पांव महल से दौड़कर सुदामा को अपने गले लगा लिया था।

पंचकल्याणक: दूसरे दिन वेदी शुद्धि घट यात्रा निकाली

सागर | मकरोनिया में आयोजित पंच कल्याणक महोत्सव के दूसरे दिन वेदी शुद्धि घट यात्रा निकाली गई। सुबह 6 बजे से 6.45 तक मंगल प्रभात गीत के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी पं. अभिनंदन शास्त्री सहित पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट जयपुर के विभिन्न विद्वानों ने शांति जाप, श्री जिनेन्द्र अभिषेक और पूजन कराया।

सुबह शास्त्र प्रवचन जयपुर से आए विद्वान संजीव गोधा का हुआ। इन्द्र सभा एवं राज सभा में मार्मिक तत्व चर्चा का तात्पर्य पं. अभय कुमार शास्त्री एवं सहयोगी विद्वान डाॅ. शांति कुमार पाटिल सहित अनेकानेक विद्वानों ने बताया। इसके साथ ही प्रतिष्ठा मंच पर संगीतमय, रोचक, सांस्कृतिक एवं वैराग्यमयी प्रस्तुति के साथ तत्व का आनंद लेते हुए अद्भुत धर्म प्रभावना हुई। इसी बीच में माता त्रिशला का आगमन होना एवं राजा सिद्धार्थ द्वारा 16 स्वप्नों के फलों का तात्पर्य समझाना। ऐसे ऐतिहासिक अद्भुत दृश्य धर्म प्रेमी बन्धुओं से देखते ही बने। इसके बाद सौधर्म इन्द्र, इन्द्राणी एवं राजा सिद्धार्थ सहित यज्ञ नायक-नायिका आदि समस्त राजा-रानियों सहित पंडाल में विराजमान सभी पुरुष, महिलाओं, बच्चों द्वारा संगीतमय बाध्य यंत्रों के साथ गर्भ कल्याणक पूजन का दृश्य प्रस्तुत किया गया। दोपहर की सभा में शास्त्र प्रवचन, वेदी शुद्धि, घट यात्रा प्रतिष्ठा, मंडप से श्री शांतिनाथ जिनालय अंकुर काॅलोनी तक निकाली गई। विद्वान डाॅ. हुकुमचंद भारिल्य का शास्त्र प्रवचन सांयकालीन सभा में हुआ।

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