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शादी का सपना संजोए माधुरी को आर्यिकाओं का सानिध्य मिला और संसार से विरक्ति होती गईं

अमावस्या के दिन ब्रम्हमुहूर्त में ब्रम्हलीन होने वाली आर्यिका बृषभमति माता का जीवन अनेक उतार चढ़ाव से भरा रहा।...

Dainik Bhaskar

May 17, 2018, 05:15 AM IST
शादी का सपना संजोए माधुरी को आर्यिकाओं का सानिध्य मिला और संसार से विरक्ति होती गईं
अमावस्या के दिन ब्रम्हमुहूर्त में ब्रम्हलीन होने वाली आर्यिका बृषभमति माता का जीवन अनेक उतार चढ़ाव से भरा रहा। सागर जिले के शाहपुर कस्बे में जन्मी व बचपन से सीधी सादी माधुरी (आर्यिका बृषभ मति माता का पूर्व नाम) का मन लौकिक शिक्षा से ज्यादा आध्यात्मिक शिक्षा की ओर रहा। परिवार वाले माधुरी के हाथ पीले करने का मन बना चुके थे और माधुरी ने भी संसार बसाने नए नए सपने संजो लिए थे। लेकिन भाग्य का लिखा कौन बदल सकता है ।

जब शाहपुर में 1988 में राजस्थान से विहार करते हुए आर्यिका विशाल मति माता व आर्यिका विज्ञानमति माता के संघ चातुर्मास हुआ, तो माधुरी को आर्यिकाओं का सानिध्य अच्छा लगने लगा और धीरे-धीरे संसार की मोह माया से दूर रहने का विचार आने लगा। लेकिन चातुर्मास के बाद जब उनको आर्यिका विशालमति माता की पुरानी पिच्छिका प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, तो तभी से मन में स्वयं पिच्छिका धारण करने का भाव आ गया और 1990 में आचार्य विद्यासागर महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर साधना के पथ पर आगे बढ़ने लगी। आर्यिकाओं की वैयावृत्ति करते-करते वह दिन निकट आ गया। जब अपनी दीक्षा की भावना को आर्यिका विज्ञानमति माता ने हरी झंडी दे दी।

भास्कर संवाददाता | सागर

अमावस्या के दिन ब्रम्हमुहूर्त में ब्रम्हलीन होने वाली आर्यिका बृषभमति माता का जीवन अनेक उतार चढ़ाव से भरा रहा। सागर जिले के शाहपुर कस्बे में जन्मी व बचपन से सीधी सादी माधुरी (आर्यिका बृषभ मति माता का पूर्व नाम) का मन लौकिक शिक्षा से ज्यादा आध्यात्मिक शिक्षा की ओर रहा। परिवार वाले माधुरी के हाथ पीले करने का मन बना चुके थे और माधुरी ने भी संसार बसाने नए नए सपने संजो लिए थे। लेकिन भाग्य का लिखा कौन बदल सकता है ।

जब शाहपुर में 1988 में राजस्थान से विहार करते हुए आर्यिका विशाल मति माता व आर्यिका विज्ञानमति माता के संघ चातुर्मास हुआ, तो माधुरी को आर्यिकाओं का सानिध्य अच्छा लगने लगा और धीरे-धीरे संसार की मोह माया से दूर रहने का विचार आने लगा। लेकिन चातुर्मास के बाद जब उनको आर्यिका विशालमति माता की पुरानी पिच्छिका प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, तो तभी से मन में स्वयं पिच्छिका धारण करने का भाव आ गया और 1990 में आचार्य विद्यासागर महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर साधना के पथ पर आगे बढ़ने लगी। आर्यिकाओं की वैयावृत्ति करते-करते वह दिन निकट आ गया। जब अपनी दीक्षा की भावना को आर्यिका विज्ञानमति माता ने हरी झंडी दे दी।

श्रद्धांजलि सभा : बृषभमति माता की संल्लेखना पूर्वक समाधि हो गई है। आर्यिका संघ के सानिध्य में गुरूवार को तिलकगंज जैन मंदिर से सुबह आठ बजे श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है।

अपनी शिष्या बृषभमति माता जब बीमार थीं तब उनकी गुरू आर्यिका विज्ञानमति माता ने उनकी सेवा की। बायं आर्यिका विज्ञानमति माता अपनी शिष्या बृषभमति माता को सहारा देती हुई।

एक हफ्ते पहले लिखा था आचार्यश्री को पत्र

आर्यिका बृषभ मति माता ने समाधिमरण के एक सप्ताह पहले आचार्य विद्यासागर महाराज को स्वयं अपने हाथों से पत्र लिखा था। इस पत्र को पढ़ाने के बाद ही आचार्य विद्यासागर महाराज ने वयोवृद्ध ब्रह्मचारिणी मणिबाई को सागर भेजा था। उसी पत्र के अंश :-

बीतरागाय नम:

परम पूज्य श्री के चरणों में नमोस्तु

परम पूज्य आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज के शुभाशीष से स्वास्थ्य ठीक होगा। आपके चरणों में सभी पूज्य आचार्य विगत काल में अगर कोई मैंने गलती की है। उन सबकी मैं आपसे क्षमा चाहती हूं। आप मुझे क्षमा करें। हमारे तीव्र पाप, कर्म के उदय से जिसका अब उपचार भी नहीं है। ऐसी बीमारी हो गई है। अब तो अंतिम उपाय संल्लेखना ही है। मैं, आपकी शरण में हूं। मुझे निर्देशन देने की कृपा करें। अब मात्र आप ही हमारे मार्गदर्शक है। मेरी समाधि अच्छे से हो जाए। यहीं शुभाशीष एवं निर्देशन चाहती हूं।

आपकी शिष्या

आ. बृषभमति

गुरू मां से कहती कि माताजी सब ठीक हो जाएगा

गुरू मां आर्यिका विज्ञानमति माता बताती हैं कि आर्यिका बृषभमति जी को जब भी कोई शारीरिक पीड़ा होती थी, तो सहज भाव से यही कहती थी कि माताजी सब ठीक हो जाएगा। जब उन्हें मालूम चला कि मुझे अब असाध्य रोग हो गया है, तो वे अपने व्रत संकल्प के प्रति और कठोर हो गईं। कहती रही कि ये शरीर तो फिर मिल जाएगा। लेकिन भाव खराब कर लिए तो भव खराब हो जाएगा। संघस्थ आर्यिका आदित्यमति बताती हैं कि बृषभमतिजी स्वभाव से बेहद गंभीर थीं। मधुर व कम बोलती थीं, अनेक प्रश्नों का उत्तर एक जवाब देने की कला से सब आश्चर्य चकित हो जाते थे।

पूनाबाई की लाड़ली को संसार रास नहीं आया

माताजी के गृहस्थ जीवन के भाई व मिट्ठूलाल जैन बताते हैं कि माधुरी ने मन में कभी संसार की मोह माया छोड़ने का विचार कभी नहीं आया। हां, वो संतों की सेवा में जरूर रूचि लेती थी। लेकिन आर्यिका विशालमति व आर्यिका विज्ञानमति माता का सत्संग मिलने से उसे सांसारिक भोगों से वैराग्य होने लगा और साधना के मार्ग पर अनवरत बढ़ने लगी। पिता खेमचंद व माता पूना बाई की लाड़ली को संसार रास नहीं आया और आर्यिका के रूप में साधना करके संल्लेखना पूर्वक समाधिमरण को प्राप्त किया। भक्त वीरेंद्र मालथौन ने बताया कि जब गुरू माँ आर्यिका विज्ञानमति माता जी ने अपनी शिष्या की वैयावृत्ति करने का भाव बनाया, तो उन्होंने तिलकगंज सागर में प्रवास करने का बार बार निवेदन किया और ब्र. विजय भैया के सहयोग से तिलकगंज ही नहीं पूरी सागर समाज को इसका लाभ मिला और एक तपस्वी आर्यिका कि संल्लेखना कराने का अवसर प्राप्त हुआ।

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